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एक बौद्ध भिक्षु, जो मर कर भी है जिंदा

टाशी जोंग की खांपगार मोनेस्ट्री में रखी गई है Topden Actrin की Mummy

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बैजनाथ। दोस्तों आज हम आपको बताने जा रहे हैं हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा के छोटे सा गांव की कहानी, जहां एक शरीर मरने के 13 साल बाद भी जिंदा है। जी हां, एक शरीर जो मर कर भी जिंदा है। हम लोग अक्सर कहानियों – किस्सों, किताबों और फिल्मों में एक नाम सुनते हैं…Mummy। जब भी हम ये नाम सुनते हैं तो सफेद और भूरे रंग की पट्टियों में लिपटी उस Mummy की एक तस्वीर उभर कर हमारे दिमाग में आती है। हो सकता है आपमें से कई लोगों ने सच में भी कोई Mummy देखी हो। कभी किसी बड़े से ताबूत में बंद तो कभी किसी बड़े से शीशे के बक्से में बंद लेटी हुई। लेकिन आज हम जिस शरीर की बात कर रहे हैं उसे आप सही मायने में Mummy भी नहीं कह सकते। कारण, एक तो उस शरीर को सहेजने में किसी भी प्रकार के केमिकल का प्रयोग नहीं किया गया है और दूसरा, इस शरीर को लेटा कर नहीं बल्कि बैठा कर रखा गया है।

जिला कांगड़ा का ताशिजोंग नामक स्थान बैजनाथ से पालमपुर की ओर तकरीबन दो किलोमीटर की दूरी पर है। ये पहाड़ी पर बसा एक छोटा से गांव है। इस गांव की विशेषता है यहां स्थापित बौद्ध मठ, जिसे खांपगार बौद्ध मोनेस्ट्री कहा जाता है। यूं तो हिमाचल प्रदेश में कई बौद्ध मठ हैं, लेकिन इस बौद्ध मठ की विशेषता है यहां रखी गई एक बौद्ध भीक्षू की Mummy। जी हां, एक Mummy। सीधी चढाई, पहाड़ी की चोटी पर एकांत में बसा एक घर, उस घर की सबसे ऊपरी मंजिल का एक कमरा और उस कमरे में रखी गई एक Mummy।

ये Mummy खांपगार समुदाय के सिद्ध योगी टोपडेन एक्ट्रिन ( Topden Actrin ) की है। खांपगार बौद्ध मठ ताशीजोंग में तिब्बती मूल के मुख्य टोपडेन एक्ट्रिन का निधन 1 जुलाई 2005 को हुआ था। उस वक्त एक्ट्रिन 84 वर्ष के थे। एक्ट्रिन के शिष्यों के अनुसार वे एक बहुत बड़े सिद्ध योगी थे। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने लगातार 10 साल तक एकांत में साधना की थी। जिस कारण वे अपने शरीर को किसी भी प्रकार के कष्ट को सहन करने लायक बना चुके थे। कहा जाता है कि वे किसी से ज्यादा बात भी नहीं करते थे, बस अपनी साधना में लीन रहते थे। टोपडेन एक्ट्रिन की Mummy मठ में नहीं बल्कि एक घर में रखी गई है। एक्ट्रेन की Mummy की देखभाल पोपो रैम करते हैं। पोपो इसी घर में एक्ट्रिन की Mummy के साथ रहते हैं। वे रोज एक्ट्रिन की Mummy जी पूजा करने के साथ ही अपने दिन की शुरुआत करते हैं। पोपो का कहना है कि वे नहीं चाहते कि उनके गुरु कभी उन्हें छोड़ कर जाएं। इसलिए उन्होंने अपने गुरु की शरीर को संरक्षित करने का फैसला लिया।

यूं तो अक्सर किसी भी शरीर को Mummy बनाने की प्रक्रिया में कैमिकलस का प्रयोग किया जाता है। लेकिन टोपडन एक्ट्रिन के शरीर को किसी भी प्रकार के कैमिकल से नहीं बल्कि केवल नमक का प्रयोग करके सुखाया गया है, जो कि खुद में हैरान करने वाली बात है। क्योंकि हम सब जानते हैं कि नमक शरीर को सुखाता नहीं बल्कि गलाता है। लेकिन टोपडेन एक्ट्रिन के शरीर के साथ इससे बिलकुल विपरीत हुआ और उनका शरीर सूखा। नमक द्वारा एक्ट्रिन के शरीर को सुखाने की इस प्रक्रिया में तकरीबन-तकरीबन अढाई साल का वक्त लगा। इस दौरान भारी संख्या में तिब्बती मूल के लोगों सहित कई विदेशी भी उनके दर्शनों को आते रहे।

एक्ट्रिन की Mummy को लकड़ी के बक्से में शीशे के फ्रेम में बैठी हुई मुद्रा में रखा गया है। इस Mummy को सफेद कपड़े ठीक वैसे ही पहनाए गए हैं जैसे कोई जीवीत व्यक्ति पहनता है और एक्ट्रिन की Mummy का चेहरा भी ढ़क कर रखा गया है। Mummy को देखने पर यही प्रतीत होता है जैसे कोई योगी ध्यान साधना में लीन बैठा हो। टोपडेन एक्टिन की मृत्यु के तकरीबन 13 साल बाद भी उनके शिष्य व अनुयायी उनकी पूजा करने रोज यहां आते हैं। यहां तक कि कई विदेशी लोग भी एक्ट्रिन की ममी के सामने बैठकर घंटों तक ध्यान लगाते हैं।

हम आपको बता दें कि खांपगार तिब्बती समुदाय में एक परंपरा है। इस परंपरा के अनुसार तिब्बती मठों में टोपडेन रहते हैं। टोपडेन यानी तिब्बती योगी। ये योगी किसी बोद्ध भीक्षु की तरह नहीं बल्कि सादे सफेद कपड़ों में रहते हैं। टोपडेन की उपाधी पाने के लिए 15 से 20 साल का समय लगता है। ये योगी शेष दुनिया से अलग रह कर केवल योग व ध्यान में ही रहते हैं। यहां तक कि ये लोग एक दूसरे से भी कम ही मिलते हैं। 1958 में चीन में कम्युनिस्टों के सत्तासीन होने की आशंका के चलते आठ खामत्रुल रिंपोछे 10 टोपडेन और पुनर्जन्म प्राप्त भीक्षुओं के साथ भारत आए थे। एक्ट्रिन उन्हीं 10 टोपडेन में से एक थे।

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