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BJP की चुनावी हुंकार मगर Leadership पर संशय बरकरार

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गफूर खान/धर्मशाला। त्रिदेव सम्मेलन के साथ ही बीजेपी ने चुनावी हुंकार भर दी है, लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी की बागडोर कौन संभालेगा, इस बात पर अभी भी संशय बरकरार है। पूर्व सीएम प्रेम कुमार धूमल और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा में कौन चुनावों में बीजेपी का चेहरा होगा, यह रहस्य अभी तक रहस्य ही है। इस रहस्य के चलते बीजेपी का आम कार्यकर्ता कहीं न कहीं असमंजस में दिख रहा है।

  • सरकार बनाने में अहम रोल वाले जिला कांगड़ा में ही ठीक नहीं हालात
  • ऐतिहासिक जीत के दावे, जमीनी हकीकत कुछ और ही

दोनों नेताओं का अपना अपना रसूख है और दोनों के ही वफादारों की अपनी जमात है। इसलिए जब तक स्थिति साफ नही हो जाती तब तक दोनों नेताओं के वफादारों में अंदरखाते चल रही खींचतान जारी रहेगी। इस वक्त हालात यह है कि दोनों नेताओं के वफादारों की जमात में शामिल क्षत्रप एक दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे। यह स्थिति सुधर सकती है अगर यह साफ़ हो जाए कि चुनावों में बतौर सीएम कौन पार्टी का प्रतिनिधित्व करेगा। लेकिन यह फैसला जल्द होता नजर नहीं आ रहा क्योंकि दोनों नेताओं की जड़ें मजबूत हैं और पार्टी हाईकमान को भी फैसला लेने में वक्त लगेगा।

प्रदेश में सरकार बनाने में जिला कांगड़ा का योगदान सबसे अहम रहता है। 68 सीटों वाली प्रदेश विधानसभा में 15 विधायक अकेले जिला कांगड़ा से ही चुने जाते हैं। इतिहास गवाह है कि जिसने भी जिला कांगड़ा को हल्के में लिया उसे सत्ता से बाहर रहना पड़ा है। 2012 के विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी के मिशन रिपीट में कांगड़ा ही रोड़ा बना था। प्रत्याशियों के चयन का खामियाजा बीजेपी को कुछ इस तरह से भुगतना पड़ा था कि जो बीजेपी के अपने थे वही बागी हो गए और चुनाव जीत भी गए। बीजेपी ने जहां सीट गंवाई वहीं उन नेताओं को भी खुद से दूर कर लिया। आगामी चुनावों में भी वही नेता बीजेपी को खासा नुकसान पहुंचा सकते हैं। वर्तमान में भी जिला कांगड़ा की ही बात करें तो बीजेपी की स्थिति कोई ज्यादा सुखद नहीं है। जसवां परागपुर से विधायक विक्रम ठाकुर और देहरा से रविंद्र रवि ही बीजेपी के ऐसे विधायक हैं जो गाहे वगाहे कांग्रेस सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलकर अपनी उपस्थिति का एहसास करवाते रहते हैं।

 सुलह से विपिन परमार और पालमपुर से प्रवीण शर्मा भी चुनाव हारने के बाद भी कहीं न कहीं चर्चा में रहते हैं। इसके अलावा 11विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी नेता सरकार को घेरने की बात तो दूर, अपने ही वजूद को बचाने में जुटे हुए हैं। इन 11 विधानसभा क्षेत्रों में फिलहाल विपक्ष तो कहीं नजर ही नहीं आ रहा। ऐसे में बीजेपी का मिशन 60 प्लस पूरा होगा या नहीं यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। अब जबकि बीजेपी चुनावी वर्ष में आक्रामक मुद्रा में आने की बात कर रही है तो शायद कुछ असर दिखे लेकिन जब तक प्रदेश में शीर्ष नेतृत्व से लेकर विधानसभा क्षेत्र तक चेहरों की तस्वीर साफ नहीं होती तब तक मिशन 60 प्लस खुद को वहम में रखने के अलावा बीजेपी के लिए कुछ भी नहीं होगा

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