शिशु की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी

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कोई भी शिशु जब जन्म लेता है तो उसका प्रतिरक्षा तंत्र पूरी तरह विकसित नहीं होता। गर्भ में मां का प्रतिरक्षा तंत्र हर संक्रमण को भ्रूण से दूर रखता है। जन्म लेने के बाद शिशु के आसानी से संक्रमित होने की संभावना बढ़ जाती है। शुरुआती तीन महीनों में शिशु गंभीर बीमारी का शिकार भी हो सकता है । यह संभावना तीन महीने के बाद घटने लगती है।

मान लीजिए आपका नवजात शिशु बैक्टीरिया,वाइरस और पैरासाइट्स के संपर्क में आता है तो ये उसे संक्रमित कर सकते हैं। इसके सामान्य लक्षण तापक्रम में उतार-चढ़ाव,सांस लेने में दिक्कत, चिड़चिड़ापन और बच्चे का लगातार रोना। कुछ मामलों में त्वचा पर रैशेज भी पड़ जाते हैं। जब भी शिशु में ऐसे लक्षण देखें तो तुरंत डाक्टर्स से परामर्श लें।

देखा गया है कि अधिकतर बच्चे पीलिया का शिकार हो जाते हैं। उनकी आंखों में परेशानी हो जाती है या फिर वे निमोनिया अथवा दिमागी बुखार के भी शिकार हो सकते हैं जो उनके लिए सबसे अधिक घातक है। नवजात शिशु को संक्रमण से बचाने केलिए आवश्यक है कि उसके खतरे को कम किया जाए। शिशु को पकड़ने से पहले अपने हाथों को समय समय पर धोएं।

जहां शिशु को रखा है वह जगह साफ और बैक्टीरिया मुक्त होनी चाहिए। शिशु के शरीर की सफाई का पूरा ध्यान रखें। यह भी सुनिश्चित कर लें कि जिन वस्तुओं के संपर्क में आपका शिशु आता है चाहे वह बोतल ही क्यों न हो, जीवाणुहीन होनी चाहिए। कुछ जन्मजात संक्रमण भी होते हैं, जो मां से मिल सकते हैं इसतिए माता को भी समय-समय पर अपनी जांच करवा लेना चाहिए ताकि उचित उपचार और दवाइयों के द्वारा बीमारी को भ्रूण तक जाने से रोका जा सके।

डाक्टर की सलाह के अनुसार शिशु को प्रतिरक्षा प्रदान करें। टीकाकरण लंबी सुरक्षा प्रजान करता है। इसलिए शिशु को टीका अवश्य लगवाएं। अधिकतर बीमारियों के लिए आपको शिशु रोग विशेषज्ञ की जरूरत पड़ेगी। ध्यान रखें कि शिशु कैसा महसूस कर रहा है वह स्वयं नहीं बता सकता इस लिए जरा सी भी अस्वस्थता महसूस हो तो उसे शिशु चिकित्सक के पास ले जाएं। आपकी यह थोड़ी सी सावधानी शिशु को पूर्ण सुरक्षा दे देगी।

सुबह की सैर अमृत के समान

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