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देवताओं में तीसरा स्थान ‘वरुण’ का

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देवताओं के तीन वर्गों (पृथ्वी स्थान, वायु स्थान और आकाश स्थान) में वरुण का सर्वोच्च स्थान है। देवताओं में तीसरा स्थान ‘वरुण’ का माना जाता है, जिसे समुद्र का देवता, विश्व के नियामक और शासक सत्य का प्रतीकमाना जाता है। वरुण देवता ऋतु के संरक्षक थे इसलिए इन्हें ‘ऋतस्यगोप’ भी कहा जाता था वरुण के साथ मित्र का भी उल्लेख है इन दोनों को मिलाकर मित्र वरुण कहते हैं। ऋग्वेद के मित्र और वरुण के साथ आप का भी उल्लेख किया गया है। ‘आप’ का अर्थ जल होता है। ऋग्वेद के मित्र और वरुण का सहस्र स्तम्भों वाले भवन में निवास करने का उल्लेख मिलता है।  ऐसा भी कहा गया है कि वरुण, देव लोक में सभी सितारों का मार्ग निर्धारित करते हैं। ऋग्वेद का सातवां  मंडल वरुण देवता को समर्पित है।
धारणा है कि सर्वप्रथम समस्त सुरासुरों को जीत कर राजसूय-यज्ञ जलाधीश वरुण ने ही किया था। वरुण पश्चिम दिशा के लोकपाल और जलों के अधिपति हैं। पश्चिम समुद्र-गर्भ में इनकी रत्नपुरी विभावरी है। वरुण के पुत्र पुष्कर इनके दक्षिण भाग में सदा उपस्थित रहते हैं।अनावृष्टि के समय भगवान वरुण की उपासना प्राचीन काल से होती है। ये जलों के स्वामी, जल के निवासी हैं। श्रुतियों में वरुण की स्तुतियां हैं। वरुण, कुबेर, यम आदि लोकपाल कारक-कोटि के हैं फिर भी भगवान के ही स्वरूप हैं। वरुण से संबंधित प्रार्थनाओं में भक्ति भावना की पराकाष्ठा दिखाई देती है। उदाहरण के लिए ऋग्वेद के सातवें मंडल में वरुण के लिए सुंदर प्रार्थना गीत मिलते हैं। उनके पास जादुई शक्ति मानी जाती थी, जिसका नाम था माया। ऋग्वेद का 7वां मंडल वरुण देवता को समर्पित है। कहते हैं कि किसी भी रूप में उनका दुरुपयोग सही नहीं है। वह क्रोधित हो जाएं तो दंड के रूप में लोगों को जलोदर रोग देते हैं।वरुण के पुत्र पुष्कर इनके दक्षिण भाग में सदा उपस्थित रहते हैं।
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