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मां का दूध : शिशु का सर्वोत्तम आहार

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अगस्त माह का प्रथम सप्ताह पूरे विश्व में स्तनपान सप्ताह के तौर पर मनाया जाता है। इस दौरान माताओं को स्तनपान के महत्व की जानकारी दी जाती है। नवजात शिशुओं के लिए जन्म से 6 माह तक अगर सिर्फ मां का दूध मिले तो शिशु मृत्युदर में कमी लाई जा सकती है। स्तनपान शिशु जन्म के बाद एक स्वाभाविक क्रिया है और यह शिशु के संरक्षण और संवर्द्धन का कार्य करता है। दरअसल नवजात बच्चे में रोग प्रतिरोधक शक्ति नहीं होती। यह शक्ति उसे मां के दूध से ही हासिल होती है। इसमें सहायक होता है लेक्टोफोर्मिन नामक तत्व जो मां के दूध में होता है।

जिन बच्चों को मां का दूध नहीं मिलता उनकी बुद्धि का विकास कम होता है। इसलिए 6 से 8 महीने तक बच्चे को मां का दूध मिलना ही चाहिए क्योंकि यह शिशु के लिए जीवन रक्षक ही नहीं सर्वोत्तम आहार होता है। इस सप्ताह के अंतर्गत महिलाओं को बताया जाता है कि मां के दूध में जरूरी पोषक तत्व, एंटी बॉडीज हार्मोन प्रतिरोधकारक ऑक्सीडेंट मौजूद होते हैं जो नवजात शिशु के बेहतर विकास के लिए आवश्यक हैं।

कायदे से बच्चे के जन्म से 6 महीने बाद तक मां के दूध के अलावा कोई भी ठोस या तरल आहार नहीं देना चाहिए। हां 9 महीने के बाद मसली हुई दाल ,उबला आलू, केला या दाल का पानी दे सकती हैं। अगर पानी की बात करें तो मां के दूध में काफी मात्रा में पानी होता है जिससे पानी की जरूरत गर्म या शुष्क मौसम में पूरी हो जाती है। प्रथम दूध कोलोस्ट्रम यानी वह पीला गाढ़ा दूध जो शिशु जन्म से लेकर 4-5 दिनों के भीतर उत्पन्न होता है उसमें विटमिन और अन्य पोषक तत्व काफी मात्रा में होते हैं जो संक्रमण और रतौंधी जैसे रोगों से बचाते हैं।

बोतल के दूध से संक्रमण का खतरा होता है। अगर बच्चा स्तनपान नहीं कर रहा है तो उसे दूध निकालकर चम्मच से पिलाएं।ध्यान रखें कि शिशु को सही समय और पर्याप्त मात्रा में मां का दूध न मिल पाना भी कुपोषण की समस्या का मुख्य कारण है। इसलिए शिशु जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान कराना आरंभ कर देना चाहिए। यह पूर्ण क्षमता के साथ शिशु के विकास को सुनिश्चित करता है। मां के दूध में अनेक गुणधर्म हैं जिनका अनुकरण करना नामुमकिन है। उसमें जैविक गुण होते हैं जो कृत्रिम दूध में नहीं होते। स्तनपान एक ऐसी प्रक्रिया है जो बच्चे का संबंध मां से प्रगाढ़ करता है।

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