दिव्यांगों के प्रति सोच बदल कर तो देखिए

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हर साल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 3 दिसंबर को दिव्यांग दिवस मनाया जाता है। इस आयोजन में दिव्यांगो के जीवन के तौर तरीकों को बेहतर बनाने, उनके वास्तविक जीवन में सहायता देने और उनके प्रति सहज भाव से व्यवहार करने के लिए लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए यह आयोजन होता है। अच्छा यही है कि 1992 से अब तक हर साल पूरी सफलता के साथ इसका आयोजन किया जाता है। दिव्यांगों के प्रति लोगों की सोच बदलने को यह उद्देश्य बड़ा है। इसके लिए जरूरी है कि समाज के सभी लोग जीवन के हर -एक पहलू में इन्हें शामिल करें। राजनीतिक,आर्थिक,सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों में शामिल होने की वजह से उनके अंदरहीनता की भावना नहीं आएगी। इस दिवस को मनाने के पीछे का कारण महत्वपूर्ण है।ज्यादातर तो लोग यह भी नहीं जानते कि उनके आस-पास कितने लोग दिव्यांग हैं। समाज में उन्हें बराबर काअधिकार मिल रहा है अथवा नहीं जबकि सच यह है कि अच्छी सेहत और सम्मान पाने के लिए उन्हें सामान्य लोगों से अधिक सहायता की जरूरत है। लेकिन समाज के लोग न तो उनकी जरूरतों को जानते हैं और न ही जानना चाहते हैं। अगर ध्यान दें तो दिव्यांग देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक हैं क्योंकि उचित साधनों के अभाव में वे बहुत सारी बाधाओं का सामना करते हैं।दिव्यांगता एक ऐसा विषय है जिस पर समाज और व्यक्ति गंभीरता से नहीं सोचते। कोई दफ्तर, बैंक, एटीएम, पोस्टऑफिस थाना कचहरी नहीं है, जहां विकलांगों के लिए सुविधाएं मौजूद हों। अगर दिवयांगों के लिए अधिकार हैं तो नजर कहां आते हैं ? वे ट्रेनों में अकेले यात्रा नहीं कर सकते मतदान केंद्रों पर रैंप न होने के कारण वे मताधिकार से वंचित हो जाते हैं। यह शोचनीय है और शासन-प्रशासन के लिए चेतावनी भी ,कि सहानुभूति उनसे सब रखते हैं पर उन्हें दोयम दर्जे का व्यक्ति मानते हैं। चाहे जितनी योजनाएं बनी हों पर दिव्यांग आज तक सबल नहीं हो सके । हम इंसान नहीं बन पाए बल्कि एक भीड़ में बदल गए हैं जो सिर्फ तमाशा देखती है। दिव्यांगों के प्रति हमें अपना यह नजरिया बदलना होगा।

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