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खुशियों के रंग बिखेरती होली

खुशियों के रंग बिखेरती होली

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फाल्गुन मास की पूर्णिमा रात को होलिका दहन से यह पर्व प्रारंभ होता है। पौराणिक कथा के अनुसार इस पर्व का सम्बन्ध भक्त प्रह्लाद से है। प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था और उसके पिता हिरण्यकश्यप उनके परम विरोधी थे। पिता ने अपने पुत्र को मार डालने के लिए अपनी बहन होलिका की सहायता ली। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसके शरीर को जला नहीं सकती। वह अपने भाई के कहने पर प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर लकड़ियों के ढेर पर बैठ गई। अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी गई, पर होलिका जल गयी और प्रह्लाद बच गया। इसी घटना की स्मृति में प्रतिवर्ष फाल्गुन की पूर्णिमा पर होलिका दहन किया जाता है।

फाल्गुन तक फसल पक कर तैयार हो जाती है। किसान अपनी लहलाती फसल देखकर खुशी से झूम उठते हैं। मौसम भी सुहाना होता है। सर्दी जा चुकी होती है। गर्मी अभी आई नहीं होती। ऐसे में सब खुशी से नाचते-गाते हैं। गांव में तो अभी भी फाग के गीत रात-रात में गाए जाते हैं। होली दहन के दूसरे दिन होती है, धुलेंडी। सब एक दूसरे पर गुलाल डालते हैं, गले मिलते हैं। अमीर-गरीबए छोटे-बड़े का भेदभाव भूलकर सब एक-दूसरे पर रंग डालते हैं। बच्चों का उत्साह तो देखते ही बनता है। लोग टोलियां बना-बनाकर, नाचते-गाते, परिचित-अपरिचित सभी को रंगों से सराबोर कर देते हैं। ठंडाई और गुझिया इस दिन के विशेष व्यंजन होते हैं। संध्या को जगह-जगह, होली-मिलन समारोह किए जाते हैं ।

  • उड़ता गुलाल

ब्रज के बरसाना गांव में होली एक अलग तरह से खेली जाती है, जिसे लठमार होली कहते हैं। ब्रज में वैसे भी होली खास मस्ती भरी होती है क्योंकि इसे कृष्ण और राधा के प्रेम से जोड़कर देखा जाता है। यहां की होली में मुख्यतः नंदगांव के पुरुष और बरसाने की महिलाएं भाग लेती हैं, क्योंकि कृष्ण नंदगांव के थे और राधा बरसाने की थीं। नंदगांव की टोलियां जब पिचकारियां लिए बरसाना पहुंचती हैं, तो उन पर बरसाने की महिलाएं खूब लाठियां बरसाती हैं। पुरुषों को इन लाठियों से बचना होता है और साथ ही महिलाओं को रंगों से भिगोना होता है। नंदगांव और बरसाने के लोगों का विश्वास है कि होली का लाठियों से किसी को चोट नहीं लगती है। अगर चोट लगती भी है तो लोग घाव पर मिट्टी मलकर फिर शुरू हो जाते हैं। इस दौरान भांग और ठंडाई का भी खूब इंतजाम होता है। कीर्तन मंडलियां .कान्हा बरसाने में आइ जइयो बुलाय गई राधा प्यारीए फाग खेलन आए हैं नटवर नंद किशोर और उड़त गुलाल लाल भए बदरा जैसे गीत गाती हैं। कहा जाता है कि सब जग होरीए जा ब्रज होरा याने ब्रज की होली सबसे अनूठी होती है।

  • होला मुहल्ला

होला मोहल्ला पंजाब का प्रसिद्ध उत्सव है। पवित्र सिख धर्मस्थान श्री आनन्दपुर साहिब में होली के अगले दिन से लगने वाले मेले को होला मोहल्ला कहते हैं। सिखों के लिए यह धर्मस्थान बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इस दिन यहां पर आनन्दपुर साहिब की सजावट की जाती है और विशाल लंगर का आयोजन किया जाता है। यहां पर होली पौरुष के प्रतीक पर्व के रूप में मनाई जाती है। इसीलिए गुरु गोविंद सिंह जी ने होली के लिए पुल्लिंग शब्द होला मोहल्ला का प्रयोग किया। गुरु जी इसके माध्यम से समाज के दुर्बल और शोषित वर्ग की प्रगति चाहते थे। कहते हैं सिखों के दसवें गुरु गोबिन्द सिंह ने स्वयं इस मेले की शुरुआत की थी। यह जुलूस हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहती एक छोटी नदी चरण गंगा के तट पर समाप्त होता है। होला मोहल्ला का उत्सव आनंदपुर साहिब में छरू दिन तक चलता है इस अवसर परए भांग की तरंग में मस्त घोड़ों पर सवार निहंग, हाथ में निशान साहब उठा, तलवारों के करतब दिखा कर साहस, पौरुष और उल्लास का प्रदर्शन करते हैं।

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