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जानिए किसे और कब मिलेता है वाहन सुख

जानिए किसे और कब मिलेता है वाहन सुख

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ज्योतिषीय दृष्टि से विचार करें तो जन्म के समय जिस भाव, राशि एवं स्थिति में ग्रह जन्म कुण्डली में विराजते हैं उसी आधार पर यह निर्धारित होता है कि व्यक्ति को कब और किस श्रेणी का वाहन सुख मिलेगा। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार किसी भी जातक की जन्म कुण्डली में चतुर्थ भाव से वाहन-कार, मोटरगाड़ी आदि के बारे में विचार किया जाता है।

चतुर्थ भाव को सुख का स्थान माना जाता है। वाहन का कारक ग्रह शुक्र है। किसी व्यक्ति को वाहन सुख मिलेगा अथवा नहीं उसमें शुक्र, चतुर्थ भाव एवं चैथे घर के स्वामी ग्रह की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। चतुर्थ भाव के कारक ग्रह चन्द्र एवं बुध हैं। यदि इनकी स्थिति भी कुंडली में अच्छी हो सोने पर सुहागा-अर्थात उत्तम शुभ फल की प्राप्ति होती है। भाग्य भाव और आय भाव भी इस संदर्भ में विचारणीय होते हैं।


पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार किसी भी जातक को वाहन सुख तभी संभव है जब जातक की जन्म कुण्डली में एकादश भाव में चतुर्थेश बैठा हो और लग्न में शुभ ग्रह विराजमान हो तो लगभग 12 से 15 वर्ष के पश्चात वाहन सुख पाने का सौभाग्य प्राप्त होता है। यही फल तब भी मिलता है जब चतुर्थ भाव का स्वामी नीच राशि में बैठा हो एवं लग्न में शुभ ग्रह की स्थिति हो। ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जब चतुर्थेश उच्च राशि में शुक्र के साथ हो तथा चौथे भाव में सूर्य विराजमान हो तब 30 वर्ष के पश्चात वाहन सुख मिलने की संभावना रहती है।

लग्नेश तथा चतुर्थेश एक साथ लग्न, चतुर्थ या नवम भाव में हों तो इन्हीं ग्रहों की दशा अथवा अंतर्दशा में वाहन की प्राप्ति होती है। जिन लोगों की जन्म कुण्डली में दशम भाव का स्वामी चतुर्थ के साथ युति बनाता है और दशमेश अपने नवमांश में उच्च का होता है उन्हें देर से वाहन सुख पाने का सौभाग्य मिलता है।

जब चतुर्थेश कुण्डली में स्वराशि में हो, मित्र राशि में हो, मूल त्रिकोण में हो अथवा उच्च राशि मे हों तथा चतुर्थ भाव पाप प्रभाव से मुक्त हो तब चतुर्थेश अथवा शुक्र में जो बलवान होगा वह गोचर में जब लग्न अथवा त्रिकोण में भ्रमण करेगा तब प्रयास करने पर वाहन सुख प्राप्त किया जा सकता है। पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यदि चतुर्थेश छठवें, आठवें अथवा बारहवें भाव में बैठा हो या अस्त या शत्रु ग्रहों या नीच राशिगत हो तो जातक के वाहन में स्थिरता नहीं होती, वाहन बिगड़ता रहता है।

जन्म कुण्डली में यदि चतुर्थेश लग्नेश के घर में हो तथा लग्नेश चतुर्थेश के घर में तो इन दोनों के बीच राशि परिवर्तन योग बनता है। इस योग के शुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति को वाहन सुख की प्राप्ति होती है। चैथे घर का स्वामी ग्रह तथा नवम भाव का स्वामी ग्रह लग्न स्थान में युति बनाएं तो इस योग को वाहन सुख के लिए अच्छा माना जाता है। यह ग्रह स्थिति व्यक्ति के भाग्य को प्रबल बनाती है और उसे वाहन सुख मिलता है। यद्यपि चतुर्थ भाव सुख का भाव होता है और शुक्र सांसारिक सुख प्रदान वाला ग्रह माना जाता है, तथापि चतुर्थेश एवं शुक्र की युति चतुर्थ भाव में होने पर अच्छा परिणाम प्राप्त नहीं होता है। इस स्थिति में व्यक्ति सामान्य श्रेणी की बाइक अथवा छोटी कार से ही संतुष्ट होना पड़ता है।

  • शुक्र एवं चतुर्थेश के इस सम्बन्ध पर यदि पाप ग्रह की दृष्टि हो अथवा किसी प्रकार प्रभावित कर रहे हो तो वाहन सुख का अभाव भी हो सकता है।
  • जब द्वितीयेश लग्न में हो दशमेश धनभाव में हो और चतुर्थ भाव में उच्च राशि का ग्रह हो तो उत्तम वाहन मिलता है।
  • जब लग्नेश, चतुर्थेश तथा नवमेश के परस्पर केन्द्र में रहने से वाहन सुख मिलता है।
  • जब कुण्डली में नवम, दशम अथवा एकादश भाव में शुक्र के साथ चतुर्थेश की युति होने पर बहुत ही अच्छा वाहन प्राप्त होता है। वाहन सुख मिलने में इन ग्रहों की भूमिका बहुत प्रभावी होती है।
  • यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि चतुर्थेश का संबंध शनि के साथ हो अथवा शनि शुक्र की युति हो तो वाहन सुख प्राप्ति हेतु अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है अथवा शारीरिक मेहनत से चलने वाला वाहन ही मिलता है।
  • चतुर्थेश की दशा-अंतर्दशा में भी वाहन सुख का योग बनता है। यदि चतुर्थेश बली हो, तो व्यक्ति के कार खरीदने के योग बनते हैं।
  • जब लग्नेश का संबंध चतुर्थ भाव एवं चतुर्थेश से हो, तो उसकी दशा-अंतर्दशा में वाहन सुख प्राप्त होता है।
  • जब चतुर्थेश उच्च राशि में हो, तो उसकी महादशा में अनेक वाहनों की प्राप्ति होती है।
  • जब चतुर्थेश बली हो, तो चतुर्थेश के नक्षत्र में स्थित ग्रह की दशाओं में वाहन सुख का पूर्ण योग बनता है। जैसे कुंभ लग्न की कुंडली में चतुर्थेश शुक्र चतुर्थ भाव में स्वराशि में स्थित हो तथा शनि यदि शुक्र के नक्षत्र में हो, तो शनि की दशाओं में जातक को वाहन सुख अवश्य मिलता हें।

जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव को सुख का स्थान माना जाता है और शुक्र को वाहन सुख का कारक। किसी व्यक्ति को वाहन सुख मिलेगा या नहीं, यह जानने के लिए शुक्र और चौथे भाव के स्वामी ग्रह की स्थिति का अध्ययन किया जाता है। भाग्य एवं आय भाव भी वाहन सुख के लिए महत्वपूर्ण हैं।

ग्रहों की स्थिति और वाहन सुख कुंडली में यदि चतुर्थेश (चतुर्थ भाव का स्वामी) लग्न में हो तथा लग्नेश (लग्न भाव का स्वामी) चतुर्थ भाव में हो तो इन दोनों के बीच राशि परिवर्तन योग बनेगा। इस योग के शुभ प्रभाव से व्यक्ति को मनचाहे वाहन का सुख मिलता है।

चौथे घर का स्वामी और नवम भाव का स्वामी लग्न में युति बनाएं तो यह वाहन सुख के लिए इस अच्छा योग माना जाता है। इस ग्रह स्थिति में व्यक्ति का भाग्य प्रबल होता है, जो उसे वाहन सुख दिलाता है।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार प्रचलित ज्योतिषीय मान्यता है कि गोचर में जब कभी चैथे भाव का स्वामी, नवम, दशम अथवा एकादश भाव के स्वामी के साथ चर राशि में युति सम्बन्ध बनाता है, उस समय वाहन सुख की प्राप्ति आवश्यक रूप से होती है। लेकिन इस शुभ ग्रह स्थिति को पाप ग्रह किसी प्रकार प्रभावित कर रहे हों अथवा उनकी दृष्टि पड़ रही हो तो वाहन सुख मिलना कठिन हो जाता है।

  • जब चतुर्थेश, शनि, गुरू एवं शुक्र के साथ नवम भाव में हो तथा नवमेश किसी केन्द्र या त्रिकोण में हो तो बहुवाहन का योग होता है।
  • जब लग्नेश चतुर्थ-नवम या एकादश भाव में हो तो जातक अनेक वाहनों का स्वामी होता है।
  • चतुर्थेश तथा नवमेश लाभ भाव में हों या इन दोनों की दृष्टि चतुर्थ भाव पर हो तो जातक को कई वाहनों का सुख प्राप्त होता है।

    इनके अलावा निम्न स्थितियों में भी वाहन सुख संभव होता है :

चतुर्थ स्थान में शुभ ग्रह हो तथा चन्द्र से तृतीय शुक्र हो।
चतुर्थ स्थान में शुभ ग्रह हो तथा शुक्र से तृतीय चन्द्र हो।
चतुर्थ स्थान में शुभ ग्रह हो तथा चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि हो।
चतुर्थ स्थान पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तथा चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि हो।

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