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पवित्र नदियों का संगम पंच प्रयाग

पवित्र नदियों का संगम पंच प्रयाग

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गंगा नदी हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र के गंगोत्री ग्लेशियर से निकलती है। यह नदी उत्तर भारत से बहती हुई पूर्व में बंगाल की खाड़ी में समाहित हो जाती है। इसके अलावा गंगा की सभी पांच सहायक नदियां अलकनंदा, भागीरथी, मंदाकिनी, धौलीगंगा और पिंडर उत्तराखंड के उत्तरी हिमालयी क्षेत्र से ही निकलती हैं। सबसे खास बात यह है कि गंगा के साथ-साथ इन नदियों को भी काफ़ी पवित्र माना जाता है। गंगा का इन पांचों नदियों से संगम भी होता है।

इन पांचों को संगम को विष्णु प्रयाग, नंद प्रयाग, कर्ण प्रयाग, रुद्र प्रयाग और देव प्रयाग के रूप में जाना जाता है और इन पांचों प्रयागों को पंच प्रयाग कहा जाता है। इसके अलावा, गंगा में प्रवाहित होने वाली कुछ और नदियां ब्रह्मपुत्र, गोमती, गंडक, कोसी, यमुना, घाघरा और सोन नदी भी हैं। हिंदुओं में गंगा नदी को लेकर ऐसी मान्यता है कि गंगा जी के दर्शन, स्पर्श, स्नान और पान से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। हिंदू समाज में लोग गंगा जल में स्नान करके अपने पूर्वजों एवं ईश्वर को जल अर्पण करते हैं। लोग गंगा जल को हाथों में लेकर तर्पण करते हैं तथा फूलों और दीये को गंगा में प्रवाहित करते हैं। ऐसा कोई हिंदू परिवार नहीं हो सकता, जिसके घर में गंगा जल न हो। दरअसल, हिंदू धर्म में हर धार्मिक अनुष्ठान में गंगा जल का प्रयोग होता है और इसके बिना किसी भी अनुष्ठान को शुभ और सफल नहीं माना जाता।

नदी पूजा :

पहले लोग प्रकृति पूजक थे। उसमें वृक्ष पूजा, पर्वत पूजा, नदी पूजा आदि आती हैं। हमारे देश में पूजापरंपरा में दो महान प्रसार हुए एक वैदिक दृष्टि तथा दूसरा पौराणिक। प्राचीन वैदिक कर्मकांड : यज्ञवेदी, यजमान, पुरोहित, बलि, हव्य, हवन एवं देवता तथा त्याग आदि के अनुरूप ही देवार्चा में अर्चा, अर्च्य एवं अर्चक के नाना संभार, प्रकार एवं कोटियां पल्लवित हुईं। उपासना परंपरा में नाना संप्रदायों, शैव, वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य, सोर, बौद्ध, (विशेषकर वज्रयान) एवं जैन आदि धार्मिक संप्रदायों मे अपनी अपनी धारणाओं के अनुसार प्रतिमा में देवों एवं देवियों के अगणित रूप परिकल्पित किए गए। पुराणों, आगमों, तंत्रों की आधारशिला पर यह विस्तार बहुत आगे बढ़ गया। आज इसे हम यक्षपूजा, वृक्षपूजा, देवीपूजा, कूप और नदी-पूजा तथा पौराणिक देव-देवताओं की पूजा से पाते हैं।

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