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फिर वापस लौटना…

फिर वापस लौटना…

साल से एक ही जगह रहते ऊबन सी लगने लगी थी इसलिए मैंने चंबा से कुछ दिनों के लिए बाहर जाने की तैयारी कर ली। मेरा पहला पड़ाव था खजियार। सुबह सात बजे की बस से हम डेढ़ घंटे में खजियार पहुंच गए। यह जगह ऐसी है कि यहां पहुंचते ही लगता है जैसे किसी दूसरी दुनिया में दाखिल हो गए हों। पंक्तिबद्ध देवदार वृक्षों को देखकर मन खुश हो गया। हमेशा की तरह मेरा कमरा बुक  था, पर इस बार मुझे वह कमरा नहीं मिला जिसकी खिड़की झील की तरफ खुलती थी। उस कमरे में नयी मैट बिछाई जा रही थी।
दिन भर मैं उस हरे मैदान में घूमती रही और अपनी नई कहानी के पॉइंट्स लिखती रही।  सब कुछ पहले जैसा ही था बस पैराग्लाइडिंग नहीं हो रही थी। मीडिया में खबर आते ही कि यहां यह खेल सुरक्षित नहीं था इसे बंद कर दिया गया था।
शाम होते ही आसमान बादलों से घिर गया और जोरों की बारिश होने लगी। अजीब नजारा था बारिश जैसे शीट्स में गिरने लगी थी। लोग भागे और थोड़ी ही देर में मैदान खाली हो गया। मैं इस बदलते मौसम की फोटो ले रही थी। एक लड़की मेरे पास आकर खड़ी हो गयी।
-क्या करती हैं आप? उसने पूछा
-कहानियां लिखती हूं। मैं हंस पड़ी— वैसे आप कहां से हैं?
– यहीं से, डीएवी में पढ़ती हूं।
-इज शी योर ग्रैंड मदर? मैंने दूर बैठी महिला  को देख कर कहा जो अभी उससे बात करके गई थी।
-ओह नो शी इस माय मॉम– वह खिल कर हंस पड़ी।
-देन यू मस्ट बी दी यंगर इन योर फैमिली।
-याह दैट्स ट्रू
बारिश रुक गयी थी उसके मॉम -डैड  उसे लेने आ गए। जाने से पहले मुड़कर उसने हाथ हिलाया और आगे बढ़ गयी।
-हू इज शी? उसके पापा ने पूछा…
-माय फ्रेंड—शी इज अ स्टोरी राइटर।
मैं अपनी इस नन्ही दोस्त को देख कर अभिभूत थी–एक ही पल की मुलाकात थी यह, क्या पता हम फिर कभी मिलें या नहीं पर यह दोस्ती तो याद रहेगी।
रात काफी देर तक मैं नयी कहानी पर काम करती रही। खाना होटल में ही खाया और कमरे में आ गई। ठंड काफी थी मैंने दो कंबल लपेटे और सोने की कोशिश करने लगी। पास के ही मंदिर में कोई पूजा हो रही थी ढोलक की धीमी थाप और तूरी की आवाज सुनते मैं कब सो गयी पता ही नहीं चला।
अगले दिन डलहौजी का प्रोग्राम था होटल छोडऩे से पहले मैंने मैनेजर को अपनी तीन किताबें भेंट कीं। मैंने पहली बस ली और यह नहीं देखा कि इस बस की हालत कैसी है होटल का लड़का मुझे बस में बैठा गया। पूरी खटारा बस थी, जिसके सारे नट-बोल्ट ढीले ही लगते थे। हर दस मिनट बाद कंडक्टर उतरता ठोंक-पीट करता और बस चल पड़ती। कुछ दूर जाने के बाद भेड़-बकरियों का झुंड सामने आ गया। उन्हें हटाने के लिए कंडक्टर साहब उतरे और उन्हें एक तरफ हटाने लगे। खैर रास्ता साफ हुआ और बस आगे चल पड़ी।
डलहौजी पहुंचे तो पाया कि मेरा प्रिय रेस्टोरेंट अब दो ढाबों में बदल कर रह गया था। एक खूबसूरत रेस्टोरेंट का हुलिया इस तरह बदला हुआ देख कर अफसोस तो हुआ पर जाता हुआ समय हमेशा परिवर्तन लाता है इसे नकारा भी नहीं जा सकता। मैं वहीं  बैठ कर अगली बस का इंतजार करने लगी। यहां से मुझे कांगड़ा के लिए बस लेनी थी।
– प्रिया आनंद

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