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यक्षिणी साधना से मिलेगा सबकुछ

यक्षिणी साधना से मिलेगा सबकुछ

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माना गया है कि सभी यक्षिणियां देवी दुर्गा की उपासिका या सहचरी हैं। इनकी एक बहुत बड़ी विशेषता है कि अपने सिद्ध साधक को वह भी उपलब्ध करा देती हैं जो उसके भाग्य में नहीं होता। हां इसका एक अनिवार्य नियम है कि यक्षिणी साधना जब भी और जितने दिन की भी करें, उस दौरान प्रतिदिन कुंवारी कन्याओं को भोजन कराएं और उन्हें वस्त्र, रुपए का दान दक्षिणा दें। इनकी साधना में यह अनिवार्य विधान है। समस्त यक्षिणी वर्ग की साधना लगभग एक जैसी ही है, पर इनके मंत्र अलग-अलग हैं।

इनकी साधना के दौरान साधक को पूर्ण निर्भय होना चाहिए और निर्दिष्ट संख्या में जप करने के बाद दशांश हवन-तर्पण करना चाहिए। यक्षिणी प्रसन्न होकर सबकुछ देती है, पर उससे प्राप्त धन और शक्ति का कोई दुरुपयोग करता है तो उसकी सिद्धि स्वतः समाप्त हो जाती है।
यक्षिणियों को देवी वर्ग प्राप्त है और उनमें भूत-प्रेतों और पिशाचों जैसी वृत्तियां नहीं हैं। इनमें सहनशीलता बहुत है, पर इन्हें नाराज कर दिया जाए तो ये संपूर्ण विनाश कर देती हैं। इन्हें कोई भी तांत्रिक अथवा साधक भूत-प्रेतों और जिन्नों की तरह वशीभूत नहीं कर सकता।

sadhna2धनदा यक्षिणी सिद्धि :
विधि- सबसे पहले किसी सिद्ध गुरु से यक्षिणी मंत्र प्राप्त करें। स्वयं स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनें। प्रारंभिक विधान भी किसी योग्य गुरु से ही करवाएं।
पंचोपचार पूजा ( गंध, पुष्प, धूप, नैवेद्य दीप आदि) से पीपल के वृक्ष का पूजन करें और उसी वृक्ष की किसी शाखा पर बैठ कर श्रद्धा और विश्वास के साथ धनदा यक्षिणी का देवी रूप में स्मरण करें और निम्न मंत्र का 21000 की संख्या में जप करें…
ऊं ऐं व्हीं श्रीं धनं कुरु स्वाहा।

यह जप मानसिक होना चाहिए जप मन में ही करें। स्वर निकलना तो दूर आपके होंठ भी नहीं हिलने चाहिए। जप संख्या का दस प्रतिशत हवन और तर्पण जप समाप्त होने के बाद करना आवश्यक है।

आम्र यक्षिणी साधना :
इसकी साधना आम के वृक्ष पर बैठकर की जाती है। विधि-विधान वही हैं। इसकी जपसंख्या एक लाख है। प्रतिदिन के जप के हिसाब से जपसंख्या को तय कर लें उसके बाद पूरी जपसंख्या का दशांश हवन और उसका दशांश तर्पण करें…
मंत्र-ऊँ हों हौं हं रें कुरु स्वाहा

sadhnaजया यक्षिणी :
इसकी साधना मदार (आक) के वृक्ष की जड़ पर बैठ कर की जाती है साधक पीला वस्त्र धारण करें। सारे ही वस्त्र पीले होने आवश्यक हैं। जप संख्या 11 हजार है । जप समाप्ति के बाद खीर का भोग अर्पण करें। यह यक्षिणी प्रसन्न होकर प्रकट भी हो जाती है।

मंत्र-
मंदार वृक्षवासिनी यक्ष कुलोद्भवा
जय प्रकट्टा वरदय वरदय स्वाहा।

इस मंत्र के जप का बीसवां भाग हवन औऱ हवन का दसवां भाग तर्पण करना चाहिए। सिद्ध होने पर यह सुंदर रूप में वस्त्राभूषणों से अलंकृत रमणी के रूप में प्रकट होती हैं तब उससे इच्छित वर मांग लेना चाहिए।

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