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सृष्टि का सृजन नारी से ही …

सृष्टि का सृजन नारी से ही …

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भारतीय संस्कृति में नारी के सम्मान को बहुत महत्व दिया गया है।शास्त्रों में भी कहा गया है कि जहां नारी कीपूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं।यहां पूजा का अर्थ पूजा करना नहीं है बल्कि नारी को सम्मान देना है, पर यथार्थ इसके विपरीत है। वर्तमान में जो हालात हैं उसे देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि हर जगह नारी का अपमान ही हो रहा है। भले ही लड़कियां हर क्षेत्र में बाजी मार ले रही हैं फिर भी नवजात बच्चियों की हत्या में कोई कमी नहीं आई है। और तो और लावारिस बच्चियों को छोड़ देने का नया रिवाज बन चुका है। भ्रूण हत्या पर शिकंजा कसा गया, तो इस तरह की घटनाएं सामने आने लगी हैं।


हालांकि देखा जाए तो लड़कियों का सारा जीवन काम करते ही गुजर जाता है। वे पिता के घर में काम भी करती हैं और अपनी पढ़ाई भी जारी रखती हैं। यह क्रम विवाह तक जारी रहता है और विवाह के बाद तो कहना ही क्या। दिन भर घर-परिवार में ही खटती रहती हैं। उन्हें इतना समय नहीं मिलताकि वे अपने लिए भी जी सकें। परिवार के लिए त्याग करने में महिलाएं सबसे आगे हैं। बच्चों में संस्कार मां भरती है, वह परिवार की एक-एक जरूरत का ख्याल रखती हैं सम्मान की अधिकारिणी हैं पर उसे यह सम्मान मिलता नहीं दिखाई देता। आजकल महिलाओं के साथ अभद्रता की पराकाष्ठा हो रही है। रोज ही महिलाओं के साथ किए गए अपराध सुर्खियां बनते हैं।
जरूरी है कि हम महिला की अस्मिता की रक्षा करें क्योंकि अब महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले आधी भी नहीं बची है। जिस नारी से पुरुष का अस्तित्व कायम है उसके साथ हो रहा यह अन्याय किसी भी मायने में सही नहीं कहा जा सकता। औरत की पहचान अब चूल्हे-चौके तक ही नहीं…वह देहरी के उस पार भी है और सरहद के पार भी। वह अपनों का ही ख्याल नहीं रखती बल्कि देश की रक्षक भी है। कोई क्षेत्र उससे अछूता नहीं, कोई काम उससे छूटा नहीं। वह शिक्षक है, चिकित्सक है, राजनेत्री है और ख्वाबों की उड़ान भरती पायलट और अंतरिक्ष यात्री भी है। वह यह सब नहीं होती तो भी वह सबकुछ है, क्योंकि सृष्टि का सृजन उसी के माध्यम से होता है। ब्रह्मांड से धरती तक खुद को प्रमाणित करने के बावजूद नारी को समाज से मिला अनुभव बेहद पीड़ादायक है। क्या यह स्थिति बदलनी नहीं चाहिए यह सवाल तो खुद से सभी को करना होगा।

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