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हमज़ाद

हमज़ाद

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मेरा नाम आशिमा है। मैं नहीं जानती कि मेरे मम्मी-पापा ने यह नाम क्यों रखा। पहले मैंने यह कभी जानने की कोशिश नहीं की और अब दोनों ही नहीं हैं इसलिए पूछने का सवाल ही नहीं उठता। हर आम लड़की की तरह मेरे पास भी बहुत सारे सपने थे । भविष्य के नहीं, बल्कि नींद के दौरान आने वाले सपने। इन्हीं सपनों ने जैसे मेरे लिए एक दिन परीलोक के द्वार खोल दिए। अपने सपनों के सहारे मैं ऐसी दुनिया में पहुंच गई जिसके बारे में न तो मैं किसी से कुछ कह सकती थी और न ही कहना चाहती थी। यह एक ऐसा अहसास था जिसे मैं मुट्ठी में बंद खुशबू की तरह ही छुपा कर रखना चाहती थी।


यह जनवरी का मौसम है ठंड जैसे पहाड़ों से उतर कर घरों में समा गई है। पिछले एक दिन से लगातार बर्फबारी हो रही है। सारे पहाड़…सीढ़ियों वाले खेत, चीड़…देवदार सभी सिर से पांव तक बर्फ से ढक गए हैं। और आज मैं अपने सपनों का हिसाब करने बैठी हूं। खिड़की के शीशे के पार एकदम ठंडी चांदनी है और चांद आसमान में गोल सिक्के की तरह चमक रहा है।
ऐसे मौसमों में अक्सर मेरा दिल उदास हो जाता है। मेरे पास एक अच्छी नौकरी है…अच्छे सहयोगी हैं मजाक में हदें पार कर लेने वाले जहीन दोस्त भी हैं। हैरत इस बात की है कि जो बरसों से मेरे सपनों में आता रहा है, उसे मैं जरा भी नहीं जानती। ऐसे ही किसी उदास या खुशनुमा मौसम में वह मेरे पास आ जाता है…हर बार पहले से कुछ ज्यादा मेच्योर सा दिखता हुआ। मैं इस बात को भी नहीं समझ पाई कि हर साल मेरी उम्र बढ़ने के साथ उसकी उम्र कैसे बढ़ जाती है। क्या सचमुच वह इसी दुनिया में कहीं है और हम दोनों के बीच कोई मेंटल टेली पैथी काम कर रही है…? पहली बार जब मैंने उसे देखा, तो मैं स्वीट सिक्सटीन में थी। हम सहेलियां चुपके-चुपके प्यार की बातें भी करने लग गई थीं। उसी दौरान मैंने उसे सपने में देखा। वह पहाड़ी पर बना हुआ मंदिर था, जिसकी सीढ़ियां काफी ऊंचाई तक चली गई थीं। मैंने खुद को वहीं सीढ़ियों के पास नीचे देखा। सफेद साड़ी ,हाथों में पूजा की थाली उसमें जलता दीपक और सफेद फूल। मैं ऊपर पहुंची तो वह पहाड़ी के पीछे से आ रहे सूरज को बड़े ध्यान से देख रहा था। उसने मुड़कर बड़े अधिकार से मेरे हाथों से पूजा की थाली ले ली और हम दोनों मंदिर के अंदर चले गए। मैं उसका चेहरा नहीं देख पाई, पर उसकी अंगूठी के नीले नगीने की चमक को मैं बहुत दिनों तक नहीं भुला पाई।
इसके बाद का सपना बेहद अजीब था…मैंने देखा, मैं समंदर के किनारे खड़ी हूं हौले-हौले चलती लहरें… और फिर एक बड़ी लहर ढेरों पानी की बूंदें तट पर पारे की तरह छितरा गई। बूंदें अब भी चमक रही थीं। वहीं बैठ कर मैंने उस अनाम के नाम खत लिखा और पास पड़ी बोतल में बंद कर लहरों पर छोड़ दिया।
-न जाने मेरा खत किसके हाथ लगेगा मैंने धीरे से कहा।
-किसी के हाथ नहीं लगेगा, यह देखो मेरे पास है। मैंने इसे लहरों पर से पकड़ा और तुम्हारे पास आ गया।
हाथों में हाथ लिए हम वहीं खड़े रहे…नीले आसमान के नीचे लहरें लेता समंदर हमारे सामने था। आंख खुली तो सूरज की रोशनी सीधी मेरे चेहरे पर पड़ रही थी।
इस सपने को मैं बहुत दिन तक नहीं भूल पाई। अजीब सी हालत थी मेरी। रहती मैं बाहरी दुनिया में थी पर मेरे अंदर एक दूसरी दुनिया विकसित हो रही थी। मैं एक ऐसे स्वप्न संसार में दाखिल हो गई थी जहां कुछ भी वास्तविक न था पर उसका एहसास किसी सच्चाई से कम न था। अंतराल लेकर ये सपने आते रहे …हैरानी इस बात की थी कि हर अगला सपना पिछले सपने की अगली कड़ी होता था।
वह गर्मियों की दोपहर थी जाने कैसे बरामदे में किताब पढ़ते-पढ़ते मुझे नींद आ गई। इस बार मैंने खुद को एक कब्रिस्तान में पाया … मैं चार दीवारी से घिरे सहन में नीले दरवाजे से दाखिल हुई। वहां पांच बड़ी मजारें थीं सभी मजारों पर हरी रेश्मी चद्दरें चढ़ी थीं। लोबान की खुशबू पूरे सहन में फैली हुई थी। मैंने एक मजार के सामने माथा झुकाया…और वह मेरे करीब था। उसने शहजादों की तरह कपड़े पहन रखे थे उसकी स्कलकैप देख कर मुझे हंसी आ गई।
-तुमसे कुछ कहना है बाहर चलो …उसने मेरा हाथ थामा और बाहर निकल आया।
-बोलो क्या कहना है…मैंने पूछा।
– इस तरह मुझसे मिलने की बात किसी से नहीं कहना …सहेलियों से भी नहीं।
-पहले तुम इस बात का जवाब दो कि तुम हर बार फैंसी ड्रेस में क्यों होते हो ?
-कपड़ों से क्या फर्क पड़ता है ..मैं तो वही हूं वह मुस्कुराया।
मेरी नींद खुल गई ,पर उस मुस्कुराहट की कशिश नींद टूटने के बाद भी मेरी आंखों में कैद थी।
स्कूली पढ़ाई खत्म कर हम कॉलेज में आ गए। कुछ दोस्त छूटे …कुछ नए बने और पूरे दो साल निकल गए। मैंने उसकी बात रखी और सपने की बात किसी से नहीं कही।इन दो सालों के दौरान मुझे कोई सपना नहीं आया। मेरे पास अब एक सचमुच की दुनिया थी जिसमें मेरे दोस्त और सहपाठी थे। एनुअल फंक्शन की तैयारी चल रही थी । स्टेज…कास्ट्यूम और पर्दे …नाटक के डायलाग और कत्थक की प्रैक्टिस । सुरैया भैरवी के सुरों को साधने में लगी थी और कमलजीत गज़ल पर जोर आजमाइश कर रही थीं।
उसी दौरान मैंने एक बार उसे फिर देखा।
यह बार्डर एरिया था..एक छोटी दीवारने दोनों देशों को अलग कर रखा था। मैं उसी दीवार से सिर टिकाए बैठी थी और वह मेरे बालों में बेले के फूल सजा रहा था। उसने फौजियों वाली वर्दी पहन रखी थी …उसके कंधों के सितारे चमक रहे थे।
-तुम हमेशा सफेद कपड़े क्यों पहनती हो..यह मोतियों की माला और टॉप्स।
-मुझे पसंद हैं…पर तुम उधर से कैसे आए…तुम पाकिस्तानी हो …पाकिस्तान तो हमारा दुश्मन है।
– कोई किसी का दुश्मन नहीं होता। जहां प्यार होता है वहां दुश्मनी कैसे होगी ? उसने कहा पर उसकी आवाज की उदासी छिप नहीं पाई। मैं उसके कंधे से सिर टिकाए तारों भरे आकाश को देख रही थी। वह मेरे पास था उसकी मुस्कुराहट मेरे पास थी। अचानक गोलियां चलने की आवाज आई …और वह पलक झपकते ही दीवार के पार चला गया। जाने से पहले उसने एक बार मुड़ कर देखा था…उन आंखों की उदासी मेरा दिल दहला गई थी।
मैं हैरान ही नहीं परेशान भी थी। हम बीसवीं सदी के आखिरी दौर में थे पर मेरे अंदर जैसे सदियों का फासला खत्म हो चुका था। तो क्या मेरे अवचेतन में ठहरे सातों जन्म बार-बार करवटें ले रहे थे…?
कॉलेज की पढ़ाई खत्म कर मैंने यूनिवर्सिटीमें दाखिला लिया। यह दुनिया अलग थी और इसका दायरा भी विस्तृत था। छात्रसंघ के चुनावों की धूम थी। उस दोपहर मैंने हिंदी की क्लास खत्म की और घर चली आई। खिड़की के बाहर हल्की रिमझिम हो रही थी। मैंने बिस्तर पर लेटकर एक किताब खोल ली। पढ़ते-पढ़ते मेरी आंखें भारी होने लगीं। नींद कब आई मुझे पता ही नहीं चला। यह एक पिक्चरहाल था सामने फिल्म चल रही थी। वह मेरे पास था… उसकी बाहों ने मुझे पीछे से घेर रखा था।
-आज तुम बेहद खूबसूरत लग रही हो..उसने मेरी तरफ झुक कर धीरे से कहा ।
-पर मेरा रंग तो सांवला है… मैं हंस दी ।
-मुझे सांवली लड़कियां बहुत अच्छी लगती हैं, पर मैं सिर्फ तुम्हारा वफादार हूं।
-अच्छा वह कैसे…? मुझे इस शरारत में मजा आने लगा था।
-इस लिए कि रूहें बेइमान नहीं होतीं उसने संजीदगी से कहा। वह मेरे करीब था …एक अजनबी सी पुरुष गंध मेरे होश उड़ाए दे रही थी। अंधेरे में मैंने बस उसकी हल्की सी झलक देखी किसी स्कॉलर की तरह उसने जींस और गुरु कुर्ता पहन रखा था।
-तुम्हारा नाम क्या है … मैंने उसकी ओर देखा ?
-नसीम और इसे अच्छी तरह अपने जेहन में रख लो क्योंकि इससे तुम्हारा बार-बार वास्ता पड़ेगा ।
अचानक इंटरवल हुआ और वह खामोशी से चलता हुआ दीवार से बाहर हो गया।
-अरे एक आदमी इस दीवार में गायब हो गया किसी ने कहा।
– कौन था वह.. क्या कोई जादूगर ? लोग एक-दूसरे से सवाल करने लगे थे। मैं चुपचाप सिनेमाहाल से बाहर निकल आई। खुली सड़क पर मैं किसी के कदमों की आहट महसूस करना चाहती थी, पर भरी भीड़ के रेले में वह कहीं नहीं था जो साधिकार मेरा हाथ पकड़कर अपने साथ कहीं भी ले जा सकता था।
वह पढ़ाई का आखिरी साल था इसलिए इम्तिहान खत्म होते ही हम सभी लड़कियों ने लंबे टूअर का प्रोग्राम बनाया। हमारे क्लास की दो लड़कियों के घर इंटीरियर इलाके में थे इसलिए रुकने की कोई परेशानी न थी। बस सर्पीली सड़क पर घूमती हुई चली जा रही थी…हवा में नमी थी, पर मेरी आंखों में नींद नहीं थी। मेरे सामने सबसे खूबसूरत नजारा था तारों भरा आकाश और पहाड़ों के घरों में जलती रोशनी आपस में घुलमिल गए थे। देर तक मैं खिड़की से बाहर देखती रही फिर नींद आ गई।
हमारी आंख खुली तो सुबह हो चुकी थी… बस स्टैंड पर काफी शोर-शराबा था। पता चला कि हम ठिकाने पर पहुंच चुके थे। घने जंगलों से सजा हुआ शहर हमारे सामने था। लड़कियां शॉपिंग करने चली गईं। मुझे थकान थी इसलिए मैंने जाने को मना कर दिया। कुछ देर तक मैं पेपर पढ़ती रही फिर सो गई। नींद में ही मुझे लगा जैसे सारे कमरे का रंग नीला हो गया हो। पर्दे कुर्सियां सोफा और मेरा बिस्तर भी। लगा जैसे किसी ने जादुई छड़ी फेर दी हो तभी मैंने किसी मैगजीन के पन्ने पलटने की आवाज सुनी। मुड़कर देखा तो चेयर पर कोई बैठा था और हाथ में ली हुई मैगजीन के पन्ने पलट रहा था।
-तुम कौन हो … कमरे का दरवाजा बंद था तुम अंदर कैसे आए …?
-आने के लिए क्या मुझे इजाजत लेनी पड़ेगी … वह हंसा।
-तुम्हारा नाम क्या है …? मैं सवाल पर सवाल किए जा रही थी।
-कहने को तुम कुछ भी कह सकती हो पर मैं तुम्हें अपना नाम बता चुका हूं। वह उठकर मेरे पास आया … और अचानक ही वह मेरी पहचान में आ गया। अब मुझे उससे बिल्कुल डर नहीं लग रहा था। मैंने पहली बार इतने करीब से उसका चेहरा देखा। हल्का सांवला रंग, होंठों के तीखे घुमाव और शर्मीली सी हंसी। आंख खुली तो मेरा दिल धड़क रहा था।
सपनों का यह तिलिस्म बेहद सुहावना है, पर इसका कोई सच नहीं। मैं उसके बिना जी नहीं सकती और उसे पा भी नहीं सकती। जिंदगी के कितने मोड़ पार कर चुकी हूं, पर मेरे सपनों का सिलसिला अब भी जारी है। मुझे उससे बेहद मुहब्बत है जैसे वह मेरा ही अक्स हो … मेरा ही हमज़ाद। हम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जो न मिल सकते हैं न एक दूसरे से अलग हो सकते हैं। मैं उस सच का गला भी नहीं घोंटना चाहती जो कितने सालों से मेरे मन में मेरे सपनों में जीवंत है।

-प्रिया आनंद

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