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ॐ भूर्भुवः स्वः का नियमित करें जप

ॐ भूर्भुवः स्वः का नियमित करें जप

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जो मनुष्य आलस्य छोड़ कर तीन वर्ष तक नियम और विधि-विधान सहित गायत्री मंत्र का जप करता है वह पावन रूप होकर ब्रह्मरूप को प्राप्त कर लेता है। प्रेम के संबंध में विद्वानों का मत है कि संसार में सबसे बढ़कर प्रेम है। क्योंकि प्रेम साक्षात परमात्मा का रूप है। इस लिए जहां प्रेम है वहीं सुख और शांति का साम्राज्य है। प्रेम, त्याग पूर्वक दूसरों को सुख पहुंचाने से मिलता है। अतः सभी के साथ सर्वदा सच्चे, हितकर, विनय युक्त वचन बोलकर मनसे वाणी से अच्छा बोलना चाहिए। हमेशा जिस किसी प्रकार से हो सके दूसरों का हित करने की सोचनी चाहिए। कभी भी दूसरों की वस्तु को चुराना, छीनना नहीं चाहिए, यदि कोई खुशी और अच्छे मन से कुछ भी कोई दे, तो अपने स्वार्थ के लिए न लेकर प्रिय gayatri3वचन से उन्हें संतुष्ट करना चाहिए।

यदि आपके ना लेने पर उसे दुख: होता हो और प्रेम में किसी प्रकार की बाधा आती हो तो आवश्यकतानुसार अल्प मात्रा में लेने में कोई आपत्ति नहीं। सदा दूसरों के अवगुणों को देखने से पहले उनके गुणों को ग्रहण करना चाहिए। किसी से ईर्ष्या नहीं और किसी की निंदा भी नहीं करनी चाहिए। कुछ लोग झूठी प्रशंसा भी करते हैं, एैसी प्रशंसा किसी की न करें। मन के प्रतिकूल पदार्थों के प्राप्त होने पर भी उसे ईश्वर का भेजा हुआ पुरस्कार मान कर ग्रहण करना चाहिए। कभी कितनी भी विपत्ति आ जाए, तो उस समय धैर्य और निर्भयता के साथ सबको सहन करना चाहिए और उस विपत्ति का धैर्य के साथ सामना करना चाहिए, क्योंकि इससे हममें आत्मबल की वृद्धि होती है।

gayatri4कोई भी उत्तम कर्म करने के बाद मन में अभिमान या अहंकार नहीं लाना चाहिए हमेशा लोगों में धन विद्या, बल और ऐश्वर्य आदि के प्राप्त होने पर चित्त में अहंकार और अभिमान स्वाभाविक रूप से आ जाता है इसलिए कभी अपने मन में अहंकार नहीं लाना चाहिए और मृत्यु के समान समझकर सबके साथ विनय और नम्रता का व्यवहार करना चाहिए। दैनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच गीता,रामायण जैसे धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन के लिए भी समय निकालना चाहिए। इस तरह के सदाचार का पालन करने से मनुष्य के सारे दुर्गुणों का नाश हो जाता है। उसमें स्वाभाविक रूप से क्षमा, दया, शांति, तेज, संतोष, समता ज्ञान, श्रद्धा, प्रेम, विनय पवित्रता और शीतलता जैसे बहुत से गुणों का प्रादुर्भाव हो जाता है। नित्य गायत्री उपासना करने वाला स्वतः ही अवगुणों को त्याग कर अच्छे गुणों को प्राप्त कर लेता है।

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