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14 Days : इस कुर्बानी के मायने…

14 Days : इस कुर्बानी के मायने…

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14 दिनों में मिले दर्द के बाद आमजन यह जानना चाहता है कि उसकी कुर्बानी के फायदे क्या होने वाले हैं। आप समझ गए होंगे हम यहां बात नोटों की नसबंदी की कर रहे हैं। अब सवाल यह भी उठ रहा है कि स्वाहा हो चुके काले धन की शक्ल में कितना सरकार को मिलेगा, इसका अभी तक कुछ पता नहीं, लेकिन यह सच है कि सरकार को नई मुद्रा की छपाई पर ही 11, 000 करोड़ का खर्च सहन करना होगा।

  • rbiरिजर्व बैंक पहले ही बता चुका है कि अगर सरकारी छापेखाने तय वक्त से ज्यादा काम करेंगे तब भी गैरकानूनी करार दिए गए 22 अरब नोटों को बनाने में एक साल का वक्त लगेगा।
  • ऐसे में सरकार के पास एक ही रास्ता बचता है वह यह कि करंसी नोटों का आयात किया जाए।
  • ऐसे में सरकार को पुराने नोटों को बदलने की मियाद को 50 दिनों से आगे बढ़ाना पड़ सकता है।
  • यानी हमें तीन से चार माह बाद ही पता चलेगा कि आखिर मनी इन सर्कुलेशन का कितना हिस्‍सा बैंकों के पास आया और कितना खत्‍म हो गया।

noteसरकार मान रही है कि पब्लिक के पास जो कुल 9.9 लाख करोड़ रुपए की नकदी है, उसमें 7 से 8 लाख करोड़ बैंकों के पास नकदी बदलने के लिए वापस आएंगे। क्योंकि, करंसी इन सर्कुलेशन आरबीआई की देनदारी है इसलिए जितना धन वापस नहीं लौटेगा वह रिजर्व बैंक की कमाई होगी। आरबीआई यह रकम सरकार को निवेश के लिए या लाभांश के तौर पर बांट सकता है या फिर स्वाहा हो चुकी रकम को बेकार मानकर नोटों की आपूर्ति में कमी कर सकता है, जैसा कि 1978 में किया गया था।

printing-moneyनोटों की इस नसबंदी के चलते बाजार में मांग पूरी तरह खत्‍म हो चुकी है। व्‍यापार सुन्‍न पड़ा है और तरलता संकट की वजह से वित्तीय बाजार गिरे हैं और रुपया टूट गया है। बैंकों के सामने रकम के लिए ज्यादा लंबी कतारों ने सरकार को धन निकालने और अदला-बदली के नियमों में ढील देने के लिए मजबूर किया है। ऐसे में राज्य सरकारें जमीन की रजिस्ट्रियों और वैट के संग्रह में कमी आने की वजह से कर संग्रह में गिरावट के लिए कमर कस रही हैं। उत्पादन और बिक्री में ठहराव की वजह से केंद्र को सेवा कर और उत्पाद शुल्क से हाथ धोना पड़ सकता है। 

modiमोदी के इस अभियान की सफलता इस तथ्‍य पर निर्भर है कि बड़े नोट बंद होने के बाद कितनी नकदी अदला-बदली के लिए वापस आएगी और कितनी नकदी व्यवस्था से गायब हो जाएगी। वर्ष 1978 में इसी तरह के फैसले के बाद 75 फीसदी रकम व्यवस्था में वापस आ गई थी, जबकि बाकी 25 फीसदी नकदी सिस्टम से बाहर हो गई थी। हालांकि, नकदी में काले और सफेद का कोई ठोस आंकड़ा नहीं है फिर भी तमाम आकलनों के मुताबिक 2,500 अरब से 3000 अरब रुपए की रकम शायद नोट बदली के लिए बैंकों तक नहीं आएगी अर्थात यह धन बैंकिंग सिस्‍टम से बाहर हो जाएगा। यह रकम जीडीपी के 2.4 से 3 फीसदी के बीच कहीं हो सकती है।

खैर जो भी हो यह एक आर्थिक फैसला है इसे तथ्‍यों में नापना चाहिए और फिलहाल तो इस फैसले के बाद भारत दुनिया की सबसे तेजी से थमती अर्थव्‍यवस्‍था में बदल चुका है।

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