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कैंसर पीड़ितों की मदद के लिए 18 साल की Vedika का एक प्रयास

कैंसर पीड़ितों की मदद के लिए 18 साल की Vedika का एक प्रयास

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मुंबई। जरूरतमंदों की मदद करने से बड़ा कोई परोपकार नहीं। प्रयास छोटा हो या बड़ा यह मायने नहीं रखता पर इसके पीछे उद्देश्य सही होना चाहिए। ऐसा ही उद्देश्य लेकर आगे बढ़ रही है वेदिका कंचन। 18 वर्षीय वेदिका ने मुंबई की पीरामल गैलरी में अपने बनाए चित्रों और मूर्तियों की प्रदर्शनी का आयोजन किया। इस प्रदर्शनी के पीछे वेदिका का उद्देश्य ILeap कैंसर फाउंडेशन के लिए फंड एकत्र करना था। यह संस्था उन बच्चों के इलाज के लिए काम करती है, जो कैंसर से पीड़ित हैं और वे अपना इलाज नहीं करवा पाते है। Sonder नाम से लगाई गई इस प्रदर्शनी में प्रदर्शित किए गए चित्रों का मूल स्रोत यात्राएं थीं।


Vedika Kanchan Exhibitionयात्राओं के दौरान वे जिन लोगों मिलीं तथा उनके जीवन को बेहद करीब से जाना और अनुभव किया। वेदिका का मानना है कि हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई कहानी होती ही है। विभिन्न लोगों के जीवन से जुड़ी अन्यान्य घटनाओं की विविधता ही उनकी चित्रों की प्रेरणा बनी। हालांकि उनका मानना है कि उनके चित्र यात्राओं से प्राप्त अनुभव का अंश मात्र हैं। मूलतः इसके पीछे वे लोग हैं जिनसे वे मिलीं और जिनके अनुभवों ने उनकी हर यात्रा को असाधारण बना दिया।

प्रदर्शनी की हर पेंटिंग किसी न किसी के जीवन से जुड़ी घटनाओं से प्रेरित थी। वे ज्यादातर कैनवास पर एक्रेलिक रंगों का इस्तेमाल करती हैं और कागज पर पेन से काम करती हैं। वेदिका कंचन की मां कैंसर की मरीज थीं उनके इलाज के दौरान बहुत ऐसे मरीजों से वेदिका का मिलना हुआ जो वहां इलाज के लिए आए थे। उनमें कितने तो ऐसे थे जिनके परिवार को भी घर-बार छोड़कर इलाज के लिए वहां आना पड़ा था। यही अनुभव उन्हें इस मुहिम से जोड़ने का कारण बना।

Vedika Kanchan Exhibitionउन्होंने सोच लिया कि उनसे जो भी संभव हो सकेगा वे कैंसर पीड़ितों के लिए अवश्य करेंगी इसलिए वे ILeap फाउंडेशन से जुड़ीं। यह संस्था फील्ड में काम करती है और डायग्नोसिस से इलाज के आखिरी चरण तक  बच्चों के साथ होती है। इस दौरान संस्था के लोगों का पूरा फोकस बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी होता है। वेदिका ने चार साल की उम्र से पेंटिंग की शुरुआत की, तब घर की दीवारें ही उनका कैनवास होती थीं या इधर-उधर फैले कागज जो उनकी ड्राइंग बुक बन जाते थे। वेदिका मानती हैं कि पेटिंग भी सामाजिक बदलाव से प्रभावित होती है और नए आयामों में खुद को परिवर्तित करती रहती है। यह भाव का ऐसा रूप है जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता  पर महसूस किया जा सकता है क्यों कि यह ऐसी ताकत है जो खुद के होने का सशक्तता से बोध कराती है।

-साभार

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