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सहेलियां …

सहेलियां …

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वे पूरे दस साल बाद मिली थीं मान्या और पवित्रा…दो बचपन की पक्की सहेलियां। उसे देखते ही मान्या उसकी ओर झुक आई।
-तेरा नाम मान्या क्यों…? 
– और तेरा नाम पवित्रा क्यों …? पवित्रा मुस्कुराई
फिर दोनों खिलखिला कर हंस पड़ीं। हुआ यह था कि पवित्रा का दिल काम की निरंतरता से ऊब गया था। चाहे एक हफ्ते के लिए ही सही वह ऑफिस की भीड़ से दूर कहीं जाकर आराम करना चाहती थी। उसे मान्या का ध्यान आया जो डलहौजी में रहती थी। उसने मान्या को फोन कर के किसी अच्छे से रेजॉर्ट में एक कमरा बुक करवाने को कहा तो मान्या हंसने लगी थी ।
-पवित्रा बड़े दिनों बाद याद आई मेरी…चल इसी बहाने मैं भी तेरे साथ मैं भी रह लूंगी कुछ दिनों के लिए घर के झंझटों से एकदम आजाद।
मान्या ने रेस्टहाउस का एकांत सा सेट बुक करवा लिया। बेडरूम, डायनिंग रूम और छोटा सा बरामदा। सामने लॉन और लॉन में रखी बेंत की सुंदर कुर्सियां।
हरे देवदार वृक्षों से घिरे रेस्टहाउस  के गेट पर पवित्रा पहुंची तो उसे बहुत राहत सी महसूस हुई। वे दोनों बचपन से ही साथ पढ़ी थीं और दोनों को अपना बचपन बाखूबी याद था यहां तक कि अपनी पहली मुलाकात भी। उन दोनों का एडमिशन एक ही दिन हुआ था। पवित्रा के बाल कटे थे और उसने फूलों वाली फ्रॉक पहनी थी। मान्या की स्कर्ट नीले चैक की थी, टॉप सफेद थी और उसने पोनी टेल बांध रखी थी। एडमिशन करवाकर दोनों  बाहर निकली थीं।
-तेरा नाम पवित्रा क्यों है…? अपने पापा का हाथ पकड़ कर सीढ़ियां उतरती मान्या ने नाक सिकोड़ कर पूछा था।
-और तेरा नाम मान्या क्यों है…?
-मुझे तो पता नहीं।
-मुझे भी पता नहीं…  और फिर दोनों खिलखिलाकर हंस दी थीं।
 सालों गुजर गए थे इस बात को पर जब भी वे साथ होतीं पहली मुलाकात को ड्रामे की तरह दोहरा लेती थीं।
मौसम भीगा-भीगा था…हवा थोड़ी नम थी और काले बादल धीरे-धीरे पूरे आसमान को ढंकते जा रहे थे। मान्या का भारी बैग देख कर पवित्रा हंसी।
-मानू क्या घर छोड़कर आई हो…?
– नहीं पर तेरा आइडिया अच्छा था। मुझे भी अच्छा लगा कि थोड़ा वक्त घर की धमाचौकड़ी से दूर रहकर बिताया जाए।
रात खाना खाते-खाते नौ बज गए। मौसम मई का था पर बारिश की वजह से काफी ठंड हो गई थी। खाना खत्म हुआ तो पवित्रा ने साइड लैंप ऑन किया और लिहाफ गले तक खींच कर किताब निकाल ली।
-जन्मेजय फिर कभी मिला था क्या ?
-नहीं… पवित्रा ने किताब का रुख रोशनी की ओर कर लिया।
-तूने क्या किताब पढ़ने की कसम खा रखी है ? मान्या ने उसके हाथ से किताब छीन ली। बाहर गहरा अंधेरा था… दूर कोई पक्षी लगातार आर्त स्वर में चीखता जा रहा था। उसकी आवाज थम ही नहीं रही थी। लगता था वह अपने साथियों से बिछड़ गया था। मान्या उसे सीधी नजरों से देख रही थी। पवित्रा की आंखों के नीचे हल्की स्याही दौड़ गई थी।
-पवित्रा मैंने अपूर्व से कहा था कि इस हफ्ते मैं तुम्हारी नहीं, बच्चे तुम्हारे तुम जानो।
-फिर क्या कहा अपूर्व ने…? पवित्रा मुस्कुराई।
– हंसकर बोले -मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं, क्योंकि मैं जानता हूं पवित्रा तुम्हारा पहला प्यार है।
-पहला प्यार…पवित्रा के होंठों से एक सांस फिसल सी गई। धीरे-धीरे उनकी पलकों पर नींद घिर आई और थोड़ी देर बाद दोनों ही सो गईं।
पवित्रा उठी तो सुबह बेहद प्यारी थी। पहाड़ की तीखी चोटियों के पीछे से आती रोशनी की लकीरें पूरे आकाश में फैलती जा रही थीं। उसे हैरानी थी कि इतनी गहरी नींद कैसे आई। शायद बहुत दिनों बाद वह इतनी बेफिक्र होकर सोई थी। उसने एक नजर मान्या पर डाली जो अभी भी बेसुध होकर सो रही थी। उसके चेहरे पर बच्चों जैसी मासूमियत थी। उसने स्लीपर पहना और हाथ मुंह धोने चली गई।
पवित्रा ने हौले से मान्या का माथा छुआ तो मान्या ने आंखें खोल दीं। पवित्रा के हाथों में चाय की ट्रे थी।
-यार यहां का कुक बहुत अच्छा है। उसे खाने और चाय का समय एकदम सही याद रहता है।
-बेवकूफ मैं उसे बोलकर आई थी। पवित्रा उसके पास बैठ गई।
चाय खत्म कर दोनों ने ट्रैक सूट डाले और माल रोड पर जॉगिंग करते हुए वे एक बार फिर कॉलेज के दिनों में लौट गईं।
सुबह-सुबह पेड़ों से छनकर आती धूप की खिड़कियां पूरी सड़क पर फैली हुई थीं। कोहरे की बूंदें पेड़ों के पत्तों पर टप-टप गिरीं तो  उनके होंठों पर जैसे भूली हुई हंसी थिरक गई।
पहाड़ों की एक लंबी कतार दूर तक चली गई थी। उन पर बने घर बेहद नन्हें दिखते थे। उतनी ही प्यारी दिख रही थीं उनकी रंगीन छतें लाल, सफेद ,पीली और हरी छतें…इन सबसे अलग काली स्लेट की ओस से भीगती हुई छतें।
कुछ देर तक दोनों ही खामोश… पहाड़ों की ओर देखती रहीं…एक अजीब सी शून्यता में जैसे दोनों ही एक दूसरे को डिस्टर्व न करना चाह रही हों। उस जगह से थोड़ी ही दूर सौ साल पुराना चर्च ओस में भीगता खड़ा था। हल्की हवा से कांपती टहनियों को देख मान्या सिहर गई।
– तुझे पता है  पवित्रा,  सर्दियों में यहां ढाई फुट तक की बर्फ गिर जाती है। आज से डेढ़ सौ साल पहले जब यह शहर बसा तो  तो यहां रहने वाले बहुत कम लोग थे बस कुछ अंग्रेज अधिकारी और उनके काम करने वाले थे। सर्दियों में बर्फ गिरती तो बाहर निकलना मुश्किल  हो जाता था। तब घरों के अंदर रहने वाले लोग लकड़ी के सुंदर फर्नीचर बनाते थे। उस समय के काफी फर्नीचर चर्च में अभी भी हैं।
-अमेजिंग..पवित्रा हंस दी और वे हाथों में हाथ डाले वापस लौट पड़ीं। रास्ते में अचानक ही बारिश शुरू हो गई तो दोनों ने भाग कर रेस्टहाउस तक का रास्ता पार किया। पवित्रा ने तौलिए से सिर पोंछा और उसे मान्या की ओर बढ़ा दिया।
बाहर बारिश तेज हो गई थी। मान्या  ब्रेकफास्ट के लिए कहने चली गई और पवित्रा ने फिर लिहाफ में घुसकर किताब निकाल ली। पवित्रा के सामने चाय की ट्रे रखकर मान्या ने चीजलिंग का पैकेट खोल लिया। एक-एक चीजलिंग मुंह में डालती वह खिड़की के बाहर देखती रही। बहुत कुछ कहने को था। दस साल का अंतराल था भी काफी पर ऐसा लगता था कि मान्या अपनी घर गृहस्थी की बात नहीं करना चाहती थी  और पवित्रा ने ऑफिस की बात से खुद को दूर कर रखा था।
बीच का वक्त छोड़कर दोनों ही अतीत में लौट जाना चाहती थीं …एक बहुत सुंदर अतीत। उनके बचपन से लेकर किशोर होने तक…उनके पहले प्यार के अनुभवों तक। गुप-चुप भीनी खुशबू वाले प्यार की कहानियां जिन्हें दोनों ने ही अपने दिलों में संभाल रखा था।
-पवित्रा सच बोल, जन्मेजय के बाद तुझे कोई ऐसा नहीं मिला जो उसकी जगह भर सकता  ?
-जन्मेजय जैसा कोई हो भी नहीं सकता …उतना प्रखर, बुद्धिजीवी, सौम्य…शालीन उस जैसा प्रतिभावान लेखक…उसके गुण ही तो उसका आकर्षण थे।
-फिर तुम दोनों में दूरी…?
-मुझे कुछ ही दिन बाद पता लग गया कि मैं उसके जीवन में अकेली लड़की नहीं थी। उसकी कितनी ही फैन्स थीं जो उसके साथ रात गुजारने के सपने देखती थीं। जन्मेजय को अपनी इस कामयाबी का पता था और उसका फायदा उठाना भी वह खूब जानता था, पर जिस दिन मुझे यह पता चला मेरे लिए वह उसी दिन पराया हो गया। मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैंने कोई गलती की थी। हां यह जरूर है मान्या कि मुझे अपने और जन्मेजय के संबंधों को लेकर कभी शर्मिंदगी नहीं हुई।
-वैसे जन्मेजय सांवला था पर खूबसूरत था …अट्रैक्टिव, मान्या बोली।
-सबसे खूबसूरत उसकी आंखें थीं…हमेशा कुछ सोचती हुई सी। उसके उदास होठों की मुस्कुराहट…कुछ भी तो नहीं भूलता।
-तुम लोग कभी…? मान्या ने सवालिया निगाहों से उसे  देखा।
-हां, और मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि भले ही वह टुकड़ों में बंटा था पर उस एक रात वह सिर्फ मेरा था, पर मान्या, तेरा आफ़ताब…? पवित्रा की बात उसके होंठों में ही गुम हो गई।
– बात लंबी है इसलिए मैं तुझे कल बताऊंगी, इस समय मुझे नींद आ रही है। मान्या ने लिहाफ खींच लिया और करवट बदल कर सो गई।
पवित्रा जानती थी कि मान्या को नींद नहीं आ रही थी, लेकिन इस समय वह इस तरह के सवालों से बचना चाहती थी। देर तक पवित्रा किताब में आंखें गड़ाए रही, फिर जब नींद आने लगी तो उसने किताब बंद कर लाइट ऑफ कर दी।
सुबह जब दोनों रेस्टहाउस लॉक कर बाहर आईं तो लगता था कि सारा शहर गहरी नींद सो रहा था। उस सर्पाकार सड़क पर उन दोनों के अलावा कोई नहीं था। कैंट के सामने पहुंचते ही पवित्रा के कदम थम से गए। सामने क्षितिज पर दूर एक ठहरी हुई नदी -सी दिख रही थी। हां, ठहरी हुई नदी … इतनी दूर से उसका बहाव नजर नहीं आ रहा था। बहरहाल यह एक खूबसूरत लैंडस्केप सा दिखता था। कछ पलों के लिए दोनों मुग्ध सी होकर रह गईं।
आज भी चर्च के अंदर खड़े ऊंचे देवदार धुंध में घिरे हुए थे। छाई हुई धुंध बूंदों की शक्ल में पत्तों पर टपक रही थी। दोनों एकटक सामने की पहाड़ी की ओर देख रही थीं…वहां रंगीन छतों वाले घर धुंध में घिरे हुए ऐसे दिखाई दे रहे थे जैसे किसी बच्चे ने अपने खिलौने छितरा दिए हों।
-मान्या मेरे सवाल का जवाब बाकी है … पवित्रा ने मुड़कर कहा।
-तू तो जानती है कि पापा कितने सख्त थे एकदम कट्टर ब्राह्मण और मुझे प्यार भी हुआ तो आफ़ताब से। हम दोनों ही जानते थे कि इस प्यार का अंत खुशी में नहीं होना था इसलिए हमने अपने प्यार को एक खूबसूरत मोड देकर राहें बदल लीं।
पवित्रा के होठों से एक गहरी सांस निकल गई ।
-वह जाड़ों की रात थी …जिस दिन हमने यह फैसला लिया। आफताब और मैं दोनों ही घबराए हुए थे। हम पहाड़ी के सबसे ऊपर वाले रेस्टहाउस में थे। बाहर फैली चांदनी में धीरे-धीरे बर्फ गिर रही थी। जाने क्यों उस रात पहली बार मेरा दिल किया कि उसी वक्त मुझे मौत आ जाए। मैं उसके बिना जीना ही नहीं चाहती थी।
सुबह आकाश में भोर का तारा चमक रहा था और आफताब अपना चेहरा मेरे दिल से लगाए सो रहा था। उसकी एक पलक पर आंसू की बूंद थी। मैंने हौले से वह आंसू अपनी रूमाल में समेट लिया। उस वक्त चार बजे थे। हम तैयार हुए …एक दूसरे को बाहों में समेट कर प्यार किया और फिर कभी न मिलने के लिए अलग हो गए। उसके बाद वह मुझे कभी नहीं मिला। हमारे दिल टूटे, पर हमने उसकी आवाज तक न होने दी। मैं आज तक उसे भूल नहीं पाई पवित्रा—आज भी मैं उसे, उसी शिद्दत से प्यार करती हूं।
-और अपूर्व…?
-अपूर्व के प्रति मैं पूरी तरह वफादार हूं। उसका, उसके घर और बच्चों की पूरी देखभाल करती हूं और फिर अच्छी पत्नी बनने के लिए कौमार्य कोई गारंटी तो नहीं…?
बात तीखी थी, पर सच थी और पवित्रा जानती थी कि मान्या ऐसी ही थी अपनी बात दो टूक शब्दों में कह देने वाली।
-हमने जो भी किया, वही शायद हमारे जीने की सबसे बड़ी ताकत है …पवित्रा का स्वर धीमा हो गया।
-हम शर्मिंदा क्यों हों …इट्स वेरी नेचुरल मान्या की आंखों में रोशनी झिलमिल करने लगी थी। जैसे उसकी सोचों में सितारे टंक गए थे। वे खामोशी से लौट पड़ीं।
उस रात खाना खत्म हुआ तो पवित्रा ने फिर किताब खोल ली। साइड लैंप की रोशनी उसके पीछे से आ रही थी। मान्या ने अचानक लेटे-लेटे उसके गले में बाहें डाल दीं।
-पवित्रा तेरा आना अच्छा लगा…भीड़-भाड़ से अलग एकांत में इस तरह रहना। थैंक्स कितना वक्त गुजर गया मैं अपनेआपसे इस तरह कभी नहीं मिली थी। तेरे साथ इतना वक्त गुजार कर लगता है कि मैं खुद अपने करीब हो गई हूं। पवित्रा का ध्यान किताब पर से हट गया।
-तेरा नाम मान्या क्यों …? उसने मान्या की नाक छुई।
-और तेरा पवित्रा क्यों ?
-पता नहीं …दोनों ने एक साथ कहा और खिलखिला कर हंस पड़ीं। मान्या ने लाइट ऑफ कर दी  बाहर चांद का फीका-सा  आलोक था और मौसम में भीगापन…।
-पवित्रा हमने प्यार नहीं किया है, बल्कि चांद सितारे तोड़कर अपने आंचल में बांध लिए हैं। आज तक यही सितारे तो हमारी राहें रोशन करते रहे हैं वरना हम जिंदा कैसे रहते।
पवित्रा ने कोई जवाब नहीं दिया बस आंखें बंद कर लीं.. .। -तुझे आफ़ताब बहुत याद आता है..?
-उसका कोई कसूर भी तो नहीं था मान्या का गला भर आया।
टिन की छत पर गिरती बारिश की आवाज तेज हो गई थी हवा तेज थी, इसे सरसराहट नहीं कहा जा सकता था। कुछ तीखी चिलकती सी हवा…हजार-हजार यादें जगाती हुई। पवित्रा की आंखों से न जाने कब जन्मेजय के नाम का एक आंसू फिसल कर तकिए में खो गया उसे पता ही नहीं चला।
उन्होंने प्यार किया और नाकाम रहीं,पर उन्होंने आत्महत्या नहीं की  बल्कि इसे एक खूबसूरत एहसास की तरह यादों में संजोकर आगे का जीवन जिया।
सितारों की तरह रोशन यादें ..
यादें जंगली चंपा के फूल की तरह  जिनसे सारा जंगल महक उठता है। यादें ठंड के मौसम की गुनगुनी धूप सी।
पवित्रा की आंखें भरी थीं…वह जन्मेजय को भूल नहीं सकी थी…उसने भुलाने की कोशिश भी नहीं की थी।
बाहर बारिश तेज हो गई थी …वही पक्षी फिर आर्त स्वर में चीखे जा रहा था।
कितने सालों बाद जन्मेजय उसे बेतरह याद आया था जिसे वह प्यार तो करती थी, पर स्वीकार नहीं पाई थी।
                                                                                                                                               – सुनीता तिवारी

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