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सालभर में छह माह बसता है पहाड़ का ये गांव, यहां की निराली है ये चीज

सालभर में छह माह बसता है पहाड़ का ये गांव, यहां की निराली है ये चीज

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लॉकडाउन के बीच पुनः प्रसारित होने वाले रामायण के चलते पहाड़ी प्रदेश उत्तराखंड का एक गांव बरबस ही याद आने लगता है। उत्तराखंड में नीति-माणा नाम से दो गांव पड़ते हैं जोकि एक-दूसरे से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं, लेकिन इनका नाम एक साथ ही लिया जाता है। माणा बद्रीनाथ से ऊपर बसा एक गांव है जबकि नीति उस पूरी घाटी को भी कहा जाता है जिसका विस्तार धौली गंगा नदी के इर्द-गिर्द फैलता हुआ तिब्बत की सीमाओं तक को छूता है। द्रोणागिरी इसी नीति घाटी में बसा एक बेहद खूबसूरत गांव है। यह गांव साल में सिर्फ छह माह ही आबाद होता है, लेकिन जब आबाद होता है तो इसका कोई मुकाबला नहीं रहता।


 

भोटिया जनजाति के लोगों का गांव है द्रोणागिरी

उत्तराखंड के चमोली जिले में जोशीमठ से मलारी की तरफ लगभग 50 किलोमीटर आगे चलने पर जुम्मा नाम की एक जगह पड़ती है, यहीं से द्रोणागिरी गांव के लिए पैदल मार्ग शुरू होता है। यहां धौली गंगा नदी पर बने पुल के दूसरी तरफ सीधे खड़े पहाड़ों की जो श्रृंखला दिखाई पड़ती है, उसे पार करने के बाद ही द्रोणागिरी तक पहुंचा जाता है। दस किलोमीटर का यह पैदल रास्ता काफी कठिन लेकिन रोमांचक है। द्रोणागिरी भोटिया जनजाति के लोगों का ही एक गांव है। लगभग 12 हजार फीट की ऊंचाई पर बसे इस गांव में करीब सौ परिवार रहते हैं। सर्दियों में द्रोणागिरी इस तरह बर्फ में डूब जाता है कि यहां रह पाना संभव नहीं। अक्टूबर तक सभी गांव वाले चमोली शहर के आस-पास बसे अपने अन्य गांवों में लौट जाते हैं। मई में जब बर्फ पिघल जाती है तभी गांव के लोग द्रोणागिरी वापस लौटते हैं।

 

फसलों को सहेज कर रखने के तरीके भी अद्भुत

सर्दियों में जब द्रोणागिरी के लोग गांव छोड़कर जाते हैं तो अपनी काफी फसल भी यहीं छोड़ जाते हैं। इन फसलों को सहेज कर रखने के तरीके भी अद्भुत हैं। मसलन आलू की जब अच्छी पैदावार होती है तो गांव के लोग जाते वक्त इसे कई बोरियों में भरकर घर के पास ही एक गड्ढे में दफना देते हैं। यह गड्ढा इस तरह से बनाया जाता है कि चूहे भी इसमें नहीं घुस पाते और आलू पूरे साल बिलकुल सुरक्षित रहते हैं। द्रोणागिरी गांव के लोग बताते हैं कि पहले उनका मुख्य काम तिब्बत से व्यापार करना था। भोटिया जनजाति के इन सभी लोगों के पास पहले सैकड़ों बकरियां, खच्चर और घोड़े हुआ करते थे। इन्हीं जानवरों की मदद से ये लोग नीति दर्रा पार करते हुए तिब्बत में दाखिल होते थे। लेकिन बीते कई वर्षों से इस व्यापार को बंद कर दिया गया है।

 

गांव में हनुमान जी की पूजा कभी नहीं होती

द्रोणागिरी अपने एक पौराणिक किस्से के चलते भी काफी चर्चित है। इस गांव में हनुमान जी की पूजा कभी नहीं होती, गांव के लोग हनुमान जी से नाराज़ हैं और उनके पास इसका कारण भी है। द्रोणागिरी गांव के लोग पर्वत देवता को अपना आराध्य मानते हैं और यहां सबसे बड़ी पूजा द्रोणागिरी पर्वत की ही होती है। यह वही द्रोणागिरी पर्वत है जिसका जिक्र रामायण में संजीवनी बूटी के संदर्भ में मिलता है। मान्यता है कि त्रेता युग में जब लक्ष्मण मूर्छित हुए थे तो हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने द्रोणागिरी ही आए थे और इस पर्वत का एक हिस्सा ही उखाड़ कर ले गए थे। गांव के लोग मानते हैं कि हनुमान जी उस समय उनके द्रोणागिरी पर्वत देवता की दाहिनी भुजा उखाड़ कर ले गए थे।

 

हर घर में गाय पर दूध-दही का सेवन वर्जित

गांव के लगभग हर घर में गाय पाली जाती है लेकिन सावन से पहले गांव में दूध-दहीं का सेवन बिलकुल नहीं किया जाता। सावन में गांव वाले हरियाली देवी की पूजा करते हैं और उन्हें दूध-दही का भोग लगाते हैं। इसके बाद ही लोग खुद दूध-दही खाना शुरू करते हैं। उनकी मान्यता है कि हरियाली देवी ही उनके पशुधन की रक्षा करती है लिहाजा देवी को भोग लगाने से पहले उनके लिए दूध-दही का सेवन वर्जित है। सावन से पहले यहां जो चाय भी बनती है उसमें दूश नहीं डाला जाता। यह चाय घी और नमक से बनाई जाती है जिसे यहां के लोग ज्या कहते हैं। इसमें कुछ पेड़ों की छाल भी डाली जाती है जिससे इसका रंग लगभग चाय जैसा ही हो जाता है।

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