Expand

कुंडली में कौन से ग्रहों से होते हैं रोग, यहां पढ़ें

कुंडली में कौन से ग्रहों से होते हैं रोग, यहां पढ़ें

- Advertisement -

रोग निर्धारण के क्षेत्र में चिकित्सा विज्ञान के साथ ही ज्योतिष विज्ञान के ग्रह एवं नक्षत्रों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जन्म कुंडली से इस बात को जानने में बहुत सहायता मिलती है कि व्यक्ति को कब, क्यों और किस प्रकार के रोग होने की संभावना है। जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में लग्न (देह), चतुर्थेश (मन) और पंचमेश (आत्मा) इन तीनों की स्थिति अच्छी होती है, वह सदैव स्वस्थ जीवन व्यतीत करता है।

पं. दयानन्द शास्त्री के अनुसार मंगल अग्नि तत्व, बुध पृथ्वी तत्व, वृहस्पति आकाश तत्व, शुक्र जल तत्व और शनि वायु तत्व के प्रतिनिधि है। जब किसी भी मनुष्य के शरीर में इन तत्वों की कमी अथवा वृद्धि होती हें तो (तात्कालिक ग्रह स्थितियों के आधार पर जानकर ही) कोई भी विद्वान ज्योतिषी भविष्य में होने वाले किसी रोग-व्याधि का बहुत ही आसानी से पता लगा लेता है। ज्योतिषाचार्य पं. दयानन्द शास्त्री के अनुसार यदि समय रहते इनका चिकित्सकीय एवं ज्योतिषीय उपचार दोनों कर लिए जाएं तो इन्हें घातक होने से रोका जा सकता है।

जानिए आपकी कुंडली अनुसार संभावित रोग का समय, प्रकार और कारण :

ज्योतिष के अनुसार किसी रोग विशेष की उत्पत्ति जातक के जन्म समय में किसी राशि एवं नक्षत्र विशेष में पाप ग्रहों की उपस्थिति, उन पर पाप प्रभाव, पाप ग्रहों के नक्षत्र में उपस्थिति एवं रोग कारक ग्रहों की दशा एवं दशाकाल में प्रतिकूल गोचर , पाप ग्रह अधिष्ठित राशि के स्वामी द्वारा युति या दृष्टि रोग की संभावना को बताती है।

रोग कारक ग्रह जब गोचर में जन्मकालीन स्थिति में आते हैं और अंतर-प्रत्यंतर दशा में इनका समय चलता है तो उसी समय रोग उत्पन्न होता है।

कुंडली में मौजूद कौन-सा ग्रह, कौन-सी स्थिति में है। इससे तय होता है का स्वास्थ्य कैसा होगा। अलग-अलग ग्रहों का असर भी अलग-अलग होता है।

यदि कुंडली में सूर्य, चंद्र, शनि, मंगल ग्रह विशेष भावों में राहु-केतु से पीड़ित होते हैं तभी नकारात्मक तंत्र-मंत्र व्यक्ति पर असर डालते हैं।

यदि षष्ठेश चर राशि में तथा चर नवांश में स्थित होते हैं तो रोग की अवधि छोटी होती है। द्विस्वभाव में स्थित होने पर सामान्य अवधि होती है। स्थिर राशि में होने पर रोग दीर्घकालीन होते हैं ।

ज्योतिष में चंद्रमा मन के कारक हैं। लग्न शरीर का प्रतीक है तथा सूर्य आत्मा , जन्मजात रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारक हैं अत: चंद्रमा, सूर्य एवं लग्नेश के बली होने पर व्यक्ति आरोग्य का सुख भोगता है।

राशियों, ग्रह तथा नक्षत्रों का अधिकार क्षेत्र शरीर के विभिन्न अंगों पर है इसके अतिरिक्त कुछ रोग, ग्रह अथवा नक्षत्र की स्वाभाविक प्रकृति के अनुसार जातक को कष्ट देते हैं।

कुंडली में षष्ठम भाव को रोग कारक व शनि को रोग जन्य ग्रह माना जाता है। शरीर में कब, कहां, कौन सा रोग होगा वह इसी से निर्धारित होता है। यहां पर स्थित क्रूर ग्रह पीड़ा उत्पन्न करता है। उस पर यदि शुभ ग्रहो की दृष्टि न हो तो यह अधिक कष्टकारी हो जाता है।

यदि षष्ठेश, अष्टमेश एवं द्वादशेश तथा रोग कारक ग्रह अशुभ तारा नक्षत्रों में स्थित होते हैं तो रोग की चिकित्सा निष्फल रहती है।

किस ग्रह के कारण कौन सा रोग होता है :

सूर्य – हड्डी, मुंह से झाग निकलना, रक्त चाप, पेट की दिक़्क़त

चंद्र – मानसिक तनाव, माइग्रेन, घबराहट, आशंका की बीमारी

मंगल – रक्त सम्बंधी समस्या, उच्च रक्तचाप, कैंसर, वात रोग, गठिया, बनासीर, आंव

बुध – दंत संबंधी बीमारी, हकलाहट, गुप्त रोग, त्वचा की बीमारी, कुष्ट रोग , चेचक, नाड़ी की कमजोरी

गुरु – पेट की गैस, फेफड़े की बीमारी, यकृत की दिक़्क़त, पीलिया

शुक्र – शुक्राणुओं से संबंधित, त्वचा, खुजली, मधुमेह

शनि- कोई भी लम्बी चलने वाली बीमारी जैसे एड्स, कैंसर आदि

राहू – बुखार, दिमाग़ी बीमारी, दुर्घटना आदि

केतू – रीढ़, स्वप्नदोष, कान, हार्निया

जन्मकुंडली में रोग उत्पन करने वाले ग्रहों के निदान के लिए पूजा, पाठ, मंत्र जप, हवन (यज्ञ), यंत्र, विभिन्न प्रकार के दान एवं रत्न आदि साधन ज्योतिष शास्त्र में उल्लेखित है। किसी योग्य, अनुभवी एवं कुशल ज्योतिषाचार्य की सलाह पर उपाय करते हुए रोग के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

- Advertisement -

Facebook Join us on Facebook Twitter Join us on Twitter Google+ Join us on Google+ Instagram Join us on Instagram Youtube Join us on Youtube

RELATED NEWS

हिमाचल अभी अभी बुलेटिन

Download Himachal Abhi Abhi App Himachal Abhi Abhi IOS App Himachal Abhi Abhi Android App

राशिफल

Himachal Abhi Abhi E-Paper



सब्सक्राइब करें Himachal Abhi Abhi अलर्ट
Logo - Himachal Abhi Abhi

पाएं दिनभर की बड़ी ख़बरें अपने डेस्कटॉप पर

अभी नहीं ठीक है