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अद्वैत वेदान्त के संस्थापक और महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य 

अद्वैत वेदान्त के संस्थापक और महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य 

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जगत गुरु आदि शंकराचार्य आदि शंकराचार्य एक महान दार्शनिक एवं हिंदू धर्मगुरु थे। हिंदू धार्मिक ग्रंथो के अनुसार आदि शंकराचार्य को भगवान शंकर का अवतार माना जाता है। वे अद्वैत वेदान्त के संस्थापक और हिन्दू धर्म के प्रचारक थे। आदि शंकराचार्य सनातन धर्म के जीर्णोद्धार में लगे रहे उनके प्रयासों से हिन्दू धर्म को एक नव चेतना प्राप्त हुई। भारतीय वांगमय  में जगद्गुरु शंकाचार्य का सर्वोच्च स्थान है। उन्हें भारत के ही नहीं अपितु सारे संसार के उच्चतम दार्शनिकों में महत्व का स्थान प्राप्त है। शंकराचार्य जी का जन्म का नाम: शंकर था।
शंकराचार्य ने लगभग पूरे भारत की यात्रा की और इनके जीवन का अधिकांश भाग उत्तर भारत में बीता। चार पीठों (मठ) की स्थापना करना इनका मुख्य रूप से उल्लेखनीय कार्य रहा। ये सभी आज भी मौजूद हैं। उन्होंने अनेक ग्रन्थ लिखे हैं, किन्तु उनका दर्शन विशेष रूप से उनके तीन भाष्यों में, जो उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और गीता पर हैं, मिलता है। गीता और ब्रह्मसूत्र पर अन्य आचार्यों के भी भाष्य हैं, परन्तु उपनिषदों पर समन्वयात्मक भाष्य जैसा शंकराचार्य का है, वैसा अन्य किसी का नहीं है। शंकराचार्य का जन्म दक्षिण भारत के केरल में निवास करने वाले निम्बूदरीपाद ब्राह्मणों के ‘कालडी़ ग्राम’ में 788 ई. में हुआ था।
उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय उत्तर भारत में व्यतीत किया। उनके द्वारा स्थापित ‘अद्वैत वेदांत सम्प्रदाय’ 9वीं शताब्दी में काफी लोकप्रिय हुआ। आदि शंकराचार्य को हिंदू धर्म को पुनः स्थापित एवं प्रतिष्ठित करने का श्रेय दिया जाता है। एक तरफ़ उन्होंने अद्वैत चिन्तन को पुनर्जीवित करके सनातन हिंदू धर्म के दार्शनिक आधार को सुदृढ़ किया, तो दूसरी तरफ़ उन्होंने जनसामान्य में प्रचलित मूर्तिपूजा का औचित्य सिद्ध करने का भी प्रयास किया। सनातन हिंदू धर्म को दृढ़ आधार प्रदान करने के लिये उन्होंने विरोधी पंथ के मत को भी आंशिक तौर पर अंगीकार किया।
शंकरचार्य के मायावाद पर महायान बौद्ध चिन्तन का प्रभाव माना जाता है। इसी आधार पर उन्हें ‘प्रछन्न बुद्ध’ कहा गया है।आचार्य शंकर जीवन में धर्म, अर्थ और काम को निरर्थक मानते हैं। वे ज्ञान को अद्वैत ज्ञान की परम साधना मानते हैं, क्योंकि ज्ञान समस्त कर्मों को जलाकर भस्म कर देता है। वे सृष्टि की विवेचना करते समय इसकी उत्पत्ति का मूल कारण ब्रह्म को मानते हैं। चार मठों की स्थापना, दशनाम संन्यास को सुव्यवस्थित रूप देना, सगुण-निर्गुण का भेद मिटाने का प्रयास, हरिहर निष्ठा की स्थापना ये कार्य ही उन्हें ‘जगदगुरु’ पद पर प्रतिष्ठित करते हैं। उनका निधन 820 ई. में हुआ।

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