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क्या है अक्षय तृतीया का महत्वः देश के अन्य राज्यों में कैसे मनाते हैं ये त्योहार जानें

क्या है अक्षय तृतीया का महत्वः देश के अन्य राज्यों में कैसे मनाते हैं ये त्योहार जानें

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हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया कहा जाता है। इसे अत्यंत शुभ तिथि माना गया है। इस दिन का अर्थ है जो कभी क्षय न हो या  नष्ट न हो इसलिए इस दिन लोग सोने की खरीददारी करते हैं। इस दिन ठंडी चीजें जैसे जल से भरे घड़े, कुल्हड़, सकोरे, पंखे, खड़ाऊं, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि का दान करना बहुत ही उत्तम माना जाता है।  ज्योतिषीय  मान्यता के अनुसार इस दिन भाग्योदय के लिए शंख और मोरपंख भी खरीदना शुभ माना गया है। कोरोनावायरस के चलते इन दिनों देश भर में लोग लॉकडाउन के कारण बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। ऐसे में घरों में बैठ कर ही पूजा की जा सकती है। 
अक्षय तृतीया को सामान्यत: आखातीज’ या ‘अक्खा तीज’ के नाम से भी पुकारा जाता है। यह दिव्य अवतार तिथि भी है, जिसमें भगवान परशुराम, नर नारायण के तीन पवित्र व शुभ अवतार हुए थे। इस दिन महालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए विशेष पूजा- पाठ करने का विधान है। देवी लक्ष्मी के प्रसन्न होने पर धन-धान्य की प्राप्‍ति होती है। बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया से प्रारंभ होकर पूर्णिमा तक बड़ी धूमधाम से उत्सव मनाया जाता है, जिसमें  कन्याएं अपने भाई, पिता तथा गांव-घर और कुटुंब के लोगों को शगुन बांटती हैं और गीत गाती हैं। अक्षय तृतीया को राजस्थान में वर्षा के लिए शगुन निकाला जाता है, वर्षा की कामना की जाती है, लड़कियां झुंड बनाकर घर-घर जाकर शगुन के गीत गाती हैं। यहां इस दिन सात तरह के अन्नों से पूजा की जाती है। मालवा में नए घड़े के ऊपर खरबूजा और आम के पल्लव रख कर पूजा होती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन कृषि कार्य का आरंभ किसानों को समृद्ध करता है।

अक्षय तृतीया का महत्व

पुराणों में उल्लेख मिलता है कि इसी दिन से त्रेता युग का आरंभ हुआ था । प्रसिद्ध तीर्थस्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुन: खुलते हैं। वृन्दावन स्थित श्री बांके बिहारी जी के मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं। अक्षय तृतीया को व्रत रखने और अधिकाधिक दान देने का बड़ा ही महात्म्य है। तृतीया तिथि मां गौरी की तिथि है, जो बल-बुद्धि वर्धक मानी गई है। अत: सुखद गृहस्थ की कामना से जो भी विवाहित स्त्री-पुरुष सम्पूर्ण शिव परिवार की पूजा करते हैं, उनके सौभाग्य में वृद्धि होती है। यदि अविवाहित स्त्री-पुरुष इस दिन श्रद्धा विश्वास से मां गौरी सहित अनंत प्रभु शिव को परिवार सहित शास्त्रीय विधि से पूजते हैं तो उन्हें सफल व सुखद वैवाहिक सूत्र में अविलम्ब  जुडऩे का अवसर अति शीघ्र मिलता है।

पूजन विधि –

इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठें। अपने नित्य कर्म से निवृत होकर स्नान करें। वैसे इस दिन समुद्र, गंगा या यमुना में स्नान करना चाहिए। इस दिन उपवास रखें और घर में ही किसी पवित्र स्थान पर विष्णु भगवान की मूर्ति या चित्र स्थापित कर पूजन का संकल्प करें। संकल्प के बाद भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं तथा उन्हें सुगंधित चंदन, पुष्पमाला अर्पण करें। नैवेद्य में जौ या जौ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पण करें। भगवान विष्णु को तुलसी अधिक प्रिय है, अत: नैवेद्य के साथ तुलसी अवश्य चढाएं। जहां तक हो सके तो ‘विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी करें। अंत में भक्ति पूर्वक आरती करें।  इस दिन सत्तू, अन्न तथा चावल से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इसे ‘नवान्न पर्व’ भी कहते हैं। इस दिन बरतन, पात्र, मिष्ठान, तरबूज, खरबूजा, दूध, दही, चावल का दान देना चाहिए।

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