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ICDS, मिड-डे मील व NHM योजनाओं के निजीकरण का विरोध, बोला हल्ला

ICDS, मिड-डे मील व NHM योजनाओं के निजीकरण का विरोध, बोला हल्ला

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शिमला। आंगनबाड़ी, आशा व मिड डे मील वर्करज ने शुक्रवार को प्रदेश भर में धरना प्रदर्शन कर आईसीडीएस, मिड-डे मील व नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) जैसी परियोजनाओं के निजीकरण का विरोध किया। यह प्रदर्शन अखिल भारतीय संयुक्त समिति के सात व आठ अगस्त को दो दिवसीय हड़ताल (Strike) के आह्वान पर किया गया। जोकि प्रदेश के 11 जिला मुख्यालयों, ब्लॉक मुख्यालयों व कार्यस्थलों पर सीटू से संबंधित यूनियनों ने किया। इस दौरान वर्करज ने केंद्र व प्रदेश सरकार को चेतावनी दी है कि अगर आईसीडीएस(ICDS), मिड डे मील व नेशनल हेल्थ मिशन जैसी परियोजनाओं का निजीकरण किया गया व आंगनबाड़ी, मिड डे मील व आशा वर्करज़ को नियमित कर्मचारी घोषित ना किया गया तो देशव्यापी आंदोलन और तेज़ होगा।

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सीटू से संबंधित आंगनबाड़ी वर्करज़ एवं हेल्परज़ यूनियन की प्रदेशाध्यक्षा नीलम जसवाल तथा हिप्र मिड-डे मील वर्करज़ यूनियन की प्रदेशाध्यक्षा कांता महंत ने कहा कि अखिल भारतीय समिति के हड़ताल के आह्वान पर हिमाचल प्रदेश में दर्जनों जगह धरने-प्रदर्शन किए गए, जिसमें प्रदेशभर के हज़ारों योजनकर्मियों ने भाग लिया। उन्होंने केंद्र सरकार से वर्ष 2013 में हुए भारतीय श्रम सम्मेलन की सिफारिश अनुसार आंगनबाड़ी, मिड डे मील व आशा कर्मियों को नियमित करने की, आंगनबाड़ी व आशा कर्मियों को हरियाणा की तर्ज़ पर वेतन और अन्य सुविधाएं देने और मिड डे मील वर्करज़ के लिए हिमाचल प्रदेश का न्यूनतम वेतन 8250 रुपये लागू करने की मांग की है। इसके अलावा उन्होंने योजनाकर्मियों के लिए पेंशन, ग्रेच्युटी, मेडिकल व छुट्टियों की सुविधा लागू करने की मांग की है।

केंद्र सरकार लगातार इन योजनाओं को कमज़ोर करने की कर रही कोशिश

उन्होंने केंद्र सरकार को चेताया है कि वह इन योजनाओं के निजीकरण का ख्याली पुलाव बनाना बंद करे। देश के अंदर चलने वाली सभी योजनाओं से देश के लगभग एक करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है जिसमें से नब्बे प्रतिशत महिलाएं हैं। उन्होंने हैरानी जताई है कि महिलाओं की सबसे ज़्यादा संख्या योजनाकर्मियों के रूप में है व यह सरकार उनका सबसे ज़्यादा आर्थिक शोषण कर रही है। केंद्र सरकार लगातार इन योजनाओं को कमज़ोर करने की कोशिश कर रही है। इन सभी योजनकर्मियों को महीने का 2300 से लेकर 6300 रुपये वेतन दिया जा रहा है जोकि देश व प्रदेश का न्यूनतम वेतन भी नहीं है। सरकार शिक्षा के अधिकार के नाम पर 25 बच्चों से नीचे संख्या होने पर हर दो वर्करज़ में से एक की छंटनी कर रही है। उन्होंने मांग की है कि मल्टीपरपज वर्करज़ का काम मिड डे मील कर्मियों से ही करवाया जाए व उनके वेतन में बढ़ोतरी की जाए।

प्री नर्सरी कक्षाओं का जिम्मा आंगनबाड़ी वर्करज को सौंपे जाने की उठाई मांग

उन्होंने मांग की है कि प्री नर्सर्री कक्षाओं के जिम्मा आंगनबाड़ी वर्करज़ को दिया जाए क्योंकि वे काफी प्रशिक्षित कर्मी हैं। इसकी एवज़ में उनका  वेतन बढाया जाए व उन्हें नियमित किया जाए। उन्होंने कहा कि कोविड.19 के दौरान आशा कर्मियों ने फ्रंटलाइन वॉरियर की तरह कार्य किया है परन्तु उन्हें इन सेवाओं व सामान्य परिस्थितियों में भी उनकी भूमिका की एवज़ में  केवल शोषण ही नसीब हुआ है। आशा वर्करज़ की सेवाओं के मध्यनजर उन्हें हरियाणा की तर्ज़ पर वेतन व सुविधाएं मिलनी चाहिए।

यहां-यहां गरजे वर्करज

शिमला, रामपुर, रोहड़ू, सोलन, अर्की, नालागढ़, नाहन, शिलाई, मंडी, जोगिन्दरनगर, सरकाघाट, सुंदरनगर, करसोग, कुल्लू, बंजार, आनी, हमीरपुर, नादौन, रैत, शाहपुर, नगरोटा सूरियां, धर्मशाला, पालमपुर, बैजनाथ, लम्बगांव, टापरी, रिकोंगपिओ, चम्बा, चुवाड़ी, तीसा, सलूणी, ऊना, अब, गगरेट, बंगाणा, सन्तोषगढ़ आदि स्थानों पर योजनाकर्मियों ने जबरदस्त प्रदर्शन किए।

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