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फलित ज्योतिष और तलाक

फलित ज्योतिष और तलाक

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हमारे दर्शनशास्त्र के अनुसार पति- पत्नी का संबंध सिर्फ एक सामाजिक समझौता मात्र ही नहीं है। अपितु जन्म-जन्मांतर का एक पवित्र बंधन है, जो दांपत्य जीवन को सरस एवं मधुर बनाए रखने का परिचायक है। यही कारण है कि पुरुष की जन्म कुंडली में लग्न स्पष्ट से ठीक सीधा 180 अंक का स्पष्ट ही जाया पत्नी मदन तथा काम का भाव सप्तम है। पति -पत्नी संज्ञा की सुस्थापना विवाह संस्कार के बाद की गई है और पत्नी को धर्मपत्नी पद से सुशोभित किया गया है। सुसंस्कृत मानव के निर्माण की प्रक्रिया में प्रथम रजोदर्शन से लेकर मृत्युपर्यंत षोडश संस्कारों की व्यवस्था हिन्दू संस्कृति की एक अद्वितीय वैज्ञानिक प्रक्रिया है जो अन्य संस्कृतियों में अप्राप्य है।

आज के भौतिक सुख सुविधा प्रधान पदार्थ प्रिय युग के युवक- युवतियों में संस्कार विहीनता के कारण सर्वत्र व्यक्तिगत स्वार्थ का विशेष प्रभाव दैनिक जीवन में बढ़ता चला जा रहा है। यही कारण है कि परिवार में प्रथम आई हुई महिलाओं द्वारा ही नवागत युवती के दैनिक जीवन में अनेकानेक मानसिक संताप शारीरिक अत्याचार की घटनाएं घटित हो रही हैं। फलत संवेदनशील महिलाएं बाध्य होकर आत्मदाह और आत्महत्या की ओर उन्मुख हो रही हैं। ऐसी अमानवीय घटनाएं न हों दाम्पत्य जीवन सुखमय रहे। अतः आधुनिक परिप्रेक्ष्य में विवाह पूर्व किशोर – किशोरी या युवक -युवतियों की जन्मुकुंडलियों का सूक्ष्म स्तरीय मिलान करने में ज्योतिर्विदों को सहयोग करना चाहिए। सम्प्रति त्रिस्कंध ज्योतिष के संहिता स्कंध में मुहूर्त ज्योतिष में अष्टकूट या द्वादशकूट के आधार पर परम्परागत जन्म कुण्डलियों के मिलान की प्रक्रिया हमारे देश में चालू है। इनमें वर कन्याओं के जन्म नक्षत्रों को ही मूलधार माना गया है।

अष्टकूट में एकोत्तर वृद्धि से 36 गुण होते हैं। इसमें अंतिम तीन कूट यथा गण राशि और नाड़ी का मिलान अधिक महत्वपूर्ण है। इनके सही शुद्ध मिलान हो जाने पर दाम्पत्य जीवन में असंतोष अलगाव आदि परिवार खण्डन की परिस्थितियों की विभीषिका कदापि नहीं बन पाएगी। अष्टकूट या द्वादश कूट मेलापक पद्धतियों के आधार पर मिलान हो जाने के बाद भी विषकन्या या विषकुमार, मंगली, कालसर्प, निस्संतान, दारिद्रय दीर्घकालीन रोग आदि पर सूक्ष्म विचार किया जाना चाहिए। आयु, लम्पट या व्यभिचारिणी, दुर्घटना योग आदि पर सूक्ष्म विचार करके फलितवेत्ता को कुंडलियों का निर्णय करना चाहिए।विवाह काल से भावी दो दशकों की समयावधि को ग्रह दशा क्रम पर विंशोत्तरी दशा पद्धति के अनुसार कारक मारक विवेचना भी परमावश्यक है। यदि ज्योतिर्विद फलित के क्षे़त्र में पूर्णसमर्पित भाव से संलग्न है तो निश्चय ही उसका निर्णय समाजहित में सराहनीय सिद्ध हो पायेगा।

दाम्पत्य सुख में बाधक कुयोग निवारण के लिए ज्योतिष की निदानात्मक शाखा में वर्णित अर्द्ध कुंभ, अश्वत्थ विवाह कालसर्प के लिए फलदान शिव-पार्वती पूजन, महामृत्युंजय जप अनुष्ठान, अशुभ अमंगलकारी योग कर्ताग्रहों के लिए शान्ति विधान का संकेत उसी विधि से अभिभावकीय वित्तीय स्थिति के अनुसार ज्योतिर्विदों द्वारा निर्देशित की जानी चाहिए। हमारी यह मान्यता है कि शास्त्रोक्त विधान से शुभमुहूर्त में सम्पादित यज्ञानुष्ठान की सिद्धि आचार्य तथा कथा की श्रद्धा पर पूर्णसफल होते हैं।दाम्पत्य सुख के प्रकरण पर विचार करते समय जन्म चक्र का सिंहावलोकन किया जाना चाहिए। द्वितीय भाव कुटुम्ब सप्तम भाव पति या पत्नी अष्टम भाव मांगल्य स्थान आदि के अधिपतियों के बलाबल पर विचार करना चाहिए। पत्नी कारक शुक्र तथा सूर्य, मंगल, शनि, राहु की स्थिति, युति, योग एवं शनि और राहुचार से साढे़ साती, ग्रहण योग, पाप कर्तरी योग, पापाक्रान्त भाव योग पर सूक्ष्म विचार किया जाना चाहिए।

-कैप्टन डा. लेखराज शर्मा, शारदा ज्योतिष निकेतन, जोगिन्द्र नगर।

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