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बुनकर का राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल कर कुल्लू पहुंचे बलविंद्र पाल

बुनकर का राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल कर कुल्लू पहुंचे बलविंद्र पाल

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कुल्लू। जिला के खराहल घाटी के देव डोभी गांव के बलविंद्र पाल बुनकर के क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल करने के बाद शनिवार को कुल्लू पहुंचे। यहां पर उनका स्वागत किया गया। बलविंद्र पाल ने पिता चैहंकू राम से बुनकर की बारीकियां सीखी और उसी का नतीजा है कि बलविंद्र पाल ने बुनकर के क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार जीत कर कुल्लू जिला के साथ प्रदेश का नाम रोशन किया है। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मौके पर राजस्थान के जयपुर में 7 अगस्त को केंद्रीय कपड़ा राज्य मंत्री अजय टिमटा करने डेढ लाख रूपये की राशि स्मृति चिंह व प्रशस्ति पत्र दिया।

वर्ष 2016 के लिए बलविंद्र को मिला है यह पुरस्कार

खादी बोर्ड कुल्लू के अधिकारी विवेक शर्मा ने कहा कि वर्ष 2016 के लिए बलविंद्र को बुनकर के क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार जीता है। बलविंद्र पाल का पूरा परिवार बुनकर के क्षेत्र में बेहतर कार्य कर रहा है। बलविंद्र पाल के पिता चैहंकू राम करीब 50 वर्षों से कुल्लवी शॉल,पटटू,मफलर पर विभिन्न प्रकार के डिजाइन बना रहे है। उन्होंने कहाकि बलविंद्र पाल की मेहनत रंग लाई और कड़े परिश्रम के बाद उन्हें सफलता मिली है। उन्होंने कहा कि वस्त्र मंत्रालय में राष्ट्रीय पुरस्कार के चयन के लिए कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ता है। हजारों आवेदकों के डिजाइन को निरीक्षण करने बाद यह पुरस्कार मिलता है। उन्होंने कहा कि कुल्लू व पूरे प्रदेश के लिए यह खुशी की बात है कि बलविंद्र पाल को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है।


बेटे ने किया पिता का सपना पूरा

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता बलविंद्र सिंह ने कहा कि उनका पूरा परिवार बुनकर में शॉल, पटटू व मफलर डिजाइन कर अपनी आजीविका कमाते है और 20 वर्षों से लगातार विभिन्न प्रकार के डिजायन की शॉल ,पटटू व मफलर तैयार करते है। उन्होंने पिता से बुनकर का गुर सीखा और उसके बाद एक म्यूजियम में एक राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता की शॉल देखकर प्रेरणा मिली थी। उसके बाद बाद वर्षों की कड़ी महेनत के बाद एक बेहतर डिजाइन तैयार कर उन्होंने वस्त्र मंत्रालय की मापदंडों के हिसाब से चयन प्रक्रिया में भाग लिया। बलविंद्र के पिता चैहंकू राम ने कहा कि 50 वर्षों से उन्होंने भी लगातार प्रयास किया कि वो राष्ट्रीय पुरस्कार जीते । उनके प्रयास असफल रहे है लेकिन उनके बेटे बलविंद्र पाल ने उनका सपना साकार किया।

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