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‘बेगम जान’ Review : विद्या का किरदार दमदार पर लेखन निर्देशन कमजोर

‘बेगम जान’ Review : विद्या का किरदार दमदार पर लेखन निर्देशन कमजोर

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Begum Jaan Movie Review : मुंबई। राजकहिनी’ के हिंदी रीमेक पर वनी फिल्म ‘बेगम जान’ आज यानि शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। इस फिल्म का ट्रेलर देखने के बाद दर्शकों को इस फिल्म के आने का बेसब्री से इंतजार था। इस फिल्म में विद्या  बालन मेन लीड पर हैं। आपको बजा दें कि ‘बेगम जान’ साल 2015 में आई बांग्ला फिल्म ‘राजकहिनी’ का हिंदी रीमेक है। फिल्म का निर्देशन श्रीजीत मुखर्जी ने किया है। फिल्म की कहानी की बात करें तो इस फिल्म की कहानी 1947 में अंग्रेजों से मिली आजादी के बाद हुए विभाजन के दर्द को इस बार एक कोठे में रहने वाली 10 महिलाओं के जरिए बताया गया है।

  • फिल्म समीक्षक ने ‘बेगम जान’ को दिए तीन स्टार

फिल्म में भारत से पाकिस्तान को अलग करने के लिए एक रेडक्लिफ लाइन खींची जा रही है। जो बेगम जान यानी विद्या बालन के कोठे के बीचोंबीच से जाने वाली है। इस विभाजन में आधा कोठा हिंदुस्तान में आधा पाकिस्तान में। सरकारी हुक्मरान बेगम जान से वेश्यालय छोड़कर जाने को कहते हैं, लेकिन बेगम जान एक बार फिर अपने घर को छोड़कर नहीं जाना चाहती। छोटी उम्र में विधवा हो जाने की वजह से उसे घर से निकाल दिया गया था। मजबूरी ने उसे वेश्यावृति से जोड़ दिया। अब वह फिर से बेघर नहीं होना चाहती है क्योंकि यह कोठा सिर्फ उसका घर नहीं उसकी देश और दुनिया है।


क्या रही फिल्म की रेटिंग

इस फिल्म को देखने के जाने माने समीक्षक अजय ब्रहमात्ज ने इस फिल्म को तीन स्टार देते हुए लिखा है, ‘लेखक-निर्देशक श्रीजित मुखर्जी ने फिल्‍म के मुद्दे को सही संदर्भ और परिवेश में उठाया, लेकिन बेगम जान की कहते-कहते वे कहीं भटक गए. उन्‍हें नाहक जौहर का रास्‍ता अपनाना पड़ा और पृष्‍ठभूमि में त्रवो सुबह कभी तो आएगी’ गीत बजाना पड़ा। अपने उपसंहार में यह फिल्‍म दुविधा की शिकार होती है। अहम मुद्दे पर अहमकाना तो नहीं, लेकिन बहकी हुई फिल्‍म हमें मिलती है।

’ विद्या बालन के बारे में उन्होंने लिखा  है, ‘विद्या बालन ने बेगम जान के किरदार को तन-मन दिया है। उन्‍होंने उसके रुआब और शबाब को संजीदगी से पर्दे पर उतारा है। उनकी संवाद अदायगी और गुस्‍सैल अदाकारी बेहतरी है। उनका किरदार दमदार है, लेकिन अंतिम फैसले में वह आदर्श के बावजूद कमजोर पड़ जाती है। यह विद्या की नहीं, लेखक-निर्देशक की कमजोरी है। सहयोगी किरदारों की छोटी भूमिकाओं में अभिनेत्रियों  ने बेहतर काम किया है।

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