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3 बड़े राज्यों में हार के खतरे पर बीजेपी में मंथन शुरू, क्या मोदी का जादू फेल हुआ ?

संघ के सर्वे में पहले ही तीनों राज्यों में बीजेपी की संभावित हार के बारे में चेताया गया था

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नई दिल्ली। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में एक्जिट पोल के नतीजे बीजेपी शासित 3 बड़े राज्यों में पार्टी की हार का संकेत दे रहे हैं।बताया जाता है कि शुक्रवार को एक्जिट पोल के नतीजे आने के बाद से बीजेपी और आरएसएस में इस सवाल पर मंथन शुरू हो गया है कि आखिर हार की आशंका के बाद भी डैमेज कंट्रोल नहीं कर पाने के पीछे जिम्मेदारी किसकी है।

नहीं चला राजस्थान में मोदी का जादू

विधानसभा चुनाव के लिए मतदान से पहले ही आरएसएस के आंतरिक सर्वे में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीजेपी के हारने की आशंका जताई गई थी। संघ ने बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह और आला पदाधिकारियों को साफ कर दिया था कि अगर जल्द ही इस नुकसान की भरपाई नहीं की गई तो तीनों बड़े हिंदीभाषी राज्यों में पार्टी की हार तय है।

बीजेपी के लिए सबसे बड़ी हार राजस्थान में दिख रही है। संघ से इस बात के साफ संकेत मिलने के बाद पीएम मोदी ने राजस्थान में 13 रैलियां की।अमित शाह ने प्रदेश के सभी जिलों का दौरा किया और 38 कार्यक्रम किए। वसुंधरा राजे ने भी 75 रैलियां कीं। पार्टी के दूसरे नेताओं ने कुल 222 रैलियां और 15 रोड शो किए। इसके बाद भी राजस्थान में हार से यही संकेत मिल रहा है कि वोटरों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जादू को भी नकार दिया।

मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में सत्ता विरोधी लहर को भांप नहीं सकी बीजेपी

छत्तीसगढ़ की सत्ता पर 15 साल से काबिज बीजेपी पर हार का खतरा मंडरा रहा है। राज्य की 90 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस को 55 से 65 सीटें और बीजेपी को 21 से 31 सीटों के बीच ही संतोष करना पड़ सकता है, जबकि अन्य को 4 से 8 सीटें मिलने की संभावना है। अगर एक्जिट पोल के ये नतीजे 11 दिसंबर को मतगणना में सही साबित होते हैं तो इस हार का ठीकरा भी बीजेपी के संगठन पर फूटना तय है, जो सीएम रमण सिंह के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर को भांप नहीं सकी।

मध्यप्रदेश की 230 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी को 102 से 120 सीट और कांग्रेस 104 से 122 सीटें मिलने का अनुमान है। जबकि बसपा को 3 और अन्य को 3 से 8 सीटें मिलने का अनुमान है।संघ के सर्वे में यह साफ हो गया था कि मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह सरकार के खिलाफ परिवर्तन की लहर है। बताया जाता है कि संघ ने राज्य में मतदान के ठीक पहले मोर्चा संभाला। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। बीजेपी कार्यकर्ताओं में जीत के लिए जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास था और यह भी चुनाव प्रबंधन में कार्यकर्ताओं की लापरवाही का कारण रहा, जिसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ सकता है।

 

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