Covid-19 Update

58,460
मामले (हिमाचल)
57,260
मरीज ठीक हुए
982
मौत
11,046,914
मामले (भारत)
113,175,046
मामले (दुनिया)

अपनी पीढ़ी का चौथा 134 साल पुराना बोधिवृक्ष

अपनी पीढ़ी का चौथा 134 साल पुराना बोधिवृक्ष

- Advertisement -

Bodhi Tree: बोधिवृक्ष जो बोधगया में लगा हुआ है। यह अपनी पीढ़ी का चौथा वृक्ष है और यह 134 साल पुराना है। वह वृक्ष जिसके नीचे तथागत गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था और जिसकी टहनियों को सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र व पुत्री संघमित्रा को देकर श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार करने को भेजा था, उसे सम्राट अशोक की एक रानी तिष्यरक्षिता ने चोरी-छुपे उस समय कटवा दिया था जब सम्राट अशोक दूरवर्ती प्रदेशों की यात्रा पर थे। लेकिन कुछ ही वर्षों के बाद उस कटे हुऐ बोधिवृक्ष की जड़ से एक नया वृक्ष उग आया। यह दूसरी पीढ़ी का वृक्ष था और यह लगभग 800 सालों तक मौजूद रहा।

इस दूसरे वृक्ष को बंगाल नरेश, शशांक (सन् 602-620 ई0) जोकि ब्राह्मणधर्म के शैव सम्प्रदाय का अनुयायी था और बौद्ध धर्म का कट्टर शत्रु था, उसने जड़ सहित उखड़वाने का प्रयास किया लेकिन जब वह इसमें नाकामयाब रहा तो उसने उस बोधिवृक्ष को कटवाकर उसकी जड़ों में आग लगवाकर नष्ट कर दिया। फिर भी इसकी जड़ें पूर्ण रूप से नष्ट नहीं हो पाईं और कालांतर में कुछ ही सालों के बाद उन्हीं जड़ों से तीसरी पीढ़ी का बोधिवृक्ष निकला। और यह लगभग 1250 सालों तक मौजूद रहा।

न् 1876 में यह वृक्ष एक प्राकृतिक आपदा का शिकार होकर नष्ट हो गया। तब लार्ड कानिंघम ने सन् 1880 में श्रीलंका के अनुराधापुरम् से बोधिवृक्ष की शाखा को मांगवाकर इसे बोधगया में पुनः स्थापित कराया जो इस पीढ़ी का चौथा बोधिवृक्ष है। यह उल्लेखनीय है कि सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र वपुत्री संघमित्रा को पहले बोधिवृक्ष की जिन टहनियों को देकर श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार करने भेजा था वह आज भी श्रीलंका के अनुराधापुरम् में मौजूद है और विश्व के लिखित इतिहास की दृष्टि से यह अब तक का ज्ञात सबसे प्राचीन वृक्ष (लगभग 2250 वर्ष पुराना) है

Bodhi Tree: और बुद्ध ने तोड़ा 49 दिनों का उपवास

पांच तपस्वी साथियों के साथ वर्षों कठिन तपस्या करने के बाद गौतम बुद्ध ने चरम तप का मार्ग निर्वाण प्राप्ति के लिए अनिवार्य नहीं माना। बाद में उन तपस्वियों से अलग हो वे जब वृक्ष के नीचे बैठे तो उनमें मानवीय संवेदनाओं के अनुरूप मानवीय आहार ग्रहण करने की इच्छा उत्पन्न हुई, जिसे सुजाता नाम की महिला ने खीर अर्पण कर पूरा किया। उस वृक्ष के नीचे एक बार उसवेला के निकटवर्ती सेनानी नाम के गाँव के एक गृहस्थ की पुत्री सुजाता ने प्रतिज्ञा की थी के पुत्र-रत्न प्रप्ति के बाद वह उस वृक्ष के देव को खीर अर्पण करेगी।

जब पुत्र-प्राप्ति की उसकी अभिलाषा पूर्ण हुई, तब उसने अपनी दासी पूर्णा को उस वृक्ष के पास की जगह साफ करने को भेजा, जहां उसे खीरार्पण करना था। जगह साफ करते समय पूर्णा ने जब गौतम बुद्ध को उस पेड़ के नीचे बैठे देखा तो उन्हें ही उस पेड़ का देवता समझा और वह भागती हुई अपनी स्वामिनी को बुलाने गयी। देव की उपस्थिति के समाचार से प्रसन्न सुजाता भी तत्काल वहां पहुंची और सोने की कटोरी में बुद्ध को खीर अर्पण किया। बुद्ध ने उस कटोरी को ग्रहण कर पहले सुप्पतित्थ नदी में स्नान किया। तत्पश्चात उन्होंने उस खीर का सेवन कर अपने 49 दिनों का उपवास तोड़ा।

बुद्धं शरणं गच्छामि…धम्मं शरणं गच्छामि…

- Advertisement -

Facebook Join us on Facebook Twitter Join us on Twitter Instagram Join us on Instagram Youtube Join us on Youtube

हिमाचल अभी अभी बुलेटिन

Download Himachal Abhi Abhi App Himachal Abhi Abhi IOS App Himachal Abhi Abhi Android App

टेक्नोलॉजी / गैजेट्स / ऑटो

Himachal Abhi Abhi E-Paper


विशेष




सब्सक्राइब करें Himachal Abhi Abhi अलर्ट
Logo - Himachal Abhi Abhi

पाएं दिनभर की बड़ी ख़बरें अपने डेस्कटॉप पर

अभी नहीं ठीक है