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जानें, कौन थीं अमृता प्रीतम जिसका गूगल ने बनाया डूडल

जानें, कौन थीं अमृता प्रीतम जिसका गूगल ने बनाया डूडल

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नई दिल्ली। गूगल (Google)ने आज प्रसिद्द कवियित्री अमृता प्रीतम के 100 वें जन्मदिन पर एक डूडल (Doodle) उनको समर्पित किया है। अमृता गुजरांवाला, पंजाब (अब पाकिस्तान) में आज ही के दिन साल 1919 में जन्मी थीं। वे अपने समय की महान कवियfत्रियों में शामिल थीं। गूगल ने जो खास तरह का डूडल बनाया है उसमें एक लड़की सूट सलवार पहनकर और सिर पर दुपट्टा लिए कुछ लिखते हुए दिख रही हैं। अमृता प्रीतम ने कुल मिलाकर लगभग 100 पुस्तकें लिखी हैं। उनकी पुस्तकों को उस समय में इतना पसंद किया जाता था कि उनकी लिखी हुईं कृतियों को अनेक भाषाओं में प्रकाशित किया गया था। चलिए जानते हैं इस कवियित्री (Poetess) को गूगल ने ये ख़ास सम्मान क्यों दिया है।

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बता दें, अमृता प्रीतम को किशोरावस्था से ही पंजाबी में कविता, कहानी और निबंध लिखना अच्छा लगता था। उन्होंने 11 साल की उम्र में मां के निधन के बाद उन्होंने परिवार की जिम्मेवारी संभाली थी। उनका पहला संकलन 16 साल की उम्र में हुआ था। जब 1947 में बंटवारे का समय चल रहा था उस दौरान उन्होंने अपनी कई कहानियों में बताया है इन कहानियों को पढ़ कर आप खुद इस दर्द को महसूस कर सकते हैं। उन्होंने, 16 साल की उम्र में एक संपादक से शादी की लेकिन 1960 में उनका तलाक हो गया। 31 अक्टूबर 2005 को लंबी बीमारी के चलते 86 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।


अमृता को मिले हैं ये पुरस्कार

– साहित्य अकादमी पुरस्कार (1956)
– पद्मश्री (1969)
– डॉक्टर ऑफ लिटरेचर (दिल्ली यूनिवर्सिटी- 1973)
– डॉक्टर ऑफ लिटरेचर (जबलपुर यूनिवर्सिटी- 1973)
– बल्गारिया वैरोव पुरस्कार (बुल्गारिया – 1988)
भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार (1982)
– डॉक्टर ऑफ लिटरेचर (विश्व भारती शांतिनिकेतन- 1987)
– फ्रांस सरकार द्वारा सम्मान (1987)
– पद्म विभूषण (2004)
उनकी खास कविताएं


1. एक मुलाकात

कई बरसों के बाद अचानक एक मुलाकात
हम दोनों के प्राण एक नज्म की तरह काँपे ..
सामने एक पूरी रात थी
पर आधी नज़्म एक कोने में सिमटी रही
और आधी नज़्म एक कोने में बैठी रही
फिर सुबह सवेरे
हम काग़ज़ के फटे हुए टुकड़ों की तरह मिले
मैंने अपने हाथ में उसका हाथ लिया
उसने अपनी बाँह में मेरी बाँह डाली
और हम दोनों एक सैंसर की तरह हंसे
और काग़ज़ को एक ठंडे मेज़ पर रखकर
उस सारी नज्म पर लकीर फेर दी

2.एक घटना

तेरी यादें
बहुत दिन बीते जलावतन हुई
जीती कि मरीं-कुछ पता नहीं।
सिर्फ एक बार-एक घटना घटी
ख्यालों की रात बड़ी गहरी थी
और इतनी स्तब्ध थी
कि पत्ता भी हिले
तो बरसों के कान चौंकते।

3. खाली जगह

सिर्फ दो रजवाड़े थे
एक ने मुझे और उसे बेदखल किया था
और दूसरे को हम दोनों ने त्याग दिया था.
नग्न आकाश के नीचे-
मैं कितनी ही देर-
तन के मेंह में भीगती रही,
वह कितनी ही देर
तन के मेंह में गलता रहा.

3विश्वास

एक अफवाह बड़ी काली
एक चमगादड़ की तरह मेरे कमरे में आई है
दीवारों से टकराती
और दरारें, सुराख और सुराग ढूंढने
आँखों की काली गलियाँ
मैंने हाथों से ढक ली है
और तेरे इश्क़ की मैंने कानों में रुई लगा ली है

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