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क्यों खास है देव-मानव मिलन का उत्सव अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा

इस बार कोरोना किया दशहरे का रंग फीका

क्यों खास है देव-मानव मिलन का उत्सव अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा

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मेले और त्योहार देवभूमि हिमाचल के लोगों के जीवन का हिस्सा है। इन मेलों व त्योहारों का इंतजार लोग काफी समय से करते हैं। इन में से एक है कुल्लू (Kullu) में मनाया जाने वाला दशहरा उत्सव। कुल्लू में आठ दिनों तक चलने वाला देव-मानव मिलन का यह उत्सव इतना खास होता है कि देश-विदेश से लोग यहां के अनोखे नजारे को देखने के लिए आते हैं। दशहरे का पर्व जहां कुल्लू के लोगों के लिए भाईचारे का मिलाप है तो घाटी में रहने वाले लोगों के खेती और बागवानी कार्य समाप्त होने के बाद ग्रामीणों की खरीदारी के लिए भी खास होता है। 17वीं शताब्दी में कुल्लू के राजपरिवार द्वारा देव मिलन से शुरु हुआ महापर्व यानी कुल्लू दशहरा (Kullu Dussehra) आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है। कोरोना के चलते इस बार बेशक कुल्लू दशहरे का रंग फीका हुआ है लेकिन एक वर्ष पहले तक को इस महोत्सव में हजारों की तादाद में लोग जुटते थे। देवताओं का मिलन का भव्य नजारा होता था, खूब व्यापार होता था, विदेश से लोग यहां की संकृति को जानने के लिए पहुंचते थे।

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ये है कुल्लू दशहरे का इतिहास

पौराणिक कथाओं (Mythology) के अनुसार, 16वीं शताब्दी में कुल्लू पर राजा जगत सिंह का शासन हुआ करता था। राजा को पता चला कि उनके नगर में दुर्गादत्त नामक एक व्यक्ति है जिसके पास कीमती मोती हैं। राजा ने उससे उन मोतियों को देने का आग्रह किया। बदले में उसे हर वो चीज़ देने की बात कही जिसकी उसे जरूरत थी। दुर्गादत्त ने भी राजा का बार-बार समझाया कि उसके पास ऐसे कोई मोती नहीं। अंत में राजा के अत्याचार से परेशान होकर उसने अपने परिवार समेत आत्महत्या कर ली और राजा को श्राप दिया कि वो भी जिंदगी में हमेशा परेशान ही रहेगा जिसके बाद राजा की हालत खराब होने लगी। मदद के लिए वो एक ब्राह्मण के पास गया। राजा ने उसे बताया कि सिर्फ भगवान राम ही उसके इस कष्ट को दूर कर सकते हैं। जिसके लिए उन्हें अयोध्या से राम की मूर्ति लानी होगी।

 

 

दामोदर दास वर्ष 1651 में श्री रघुनाथजी और माता सीता की प्रतिमा लेकर गांव मकड़ाह पहुंचे। ये मूर्तियां त्रेता युग में भगवान श्रीराम के अश्वमेघ यज्ञ के दौरान बनाई गई थीं। वर्ष 1653 में रघुनाथजी की प्रतिमा को मणिकर्ण मंदिर में रखा गया और 1660 में इसे पूरे विधि-विधान से कुल्लू के रघुनाथ मंदिर में स्थापित किया गया। राजा ने अपना सारा राज-पाठ भगवान रघुनाथ के नाम कर दिया तथा स्वयं उनके छड़ीबदार बन गए। कुल्लू के 365 देवी-देवताओं ने भी श्री रघुनाथ जी को अपना ईष्ट मान लिया। असाध्य रोग से ग्रसित राजा जगत सिंह को झीड़ी के एक पयोहारी बाबा किशन दास ने सलाह दी थी कि वह अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर से भगवान राम चंद्र, माता सीता और रामभक्त हनुमान की मूर्ति लाकर कुल्लू के मंदिर में स्थापित कर अपना राज-पाठ भगवान रघुनाथ को सौंप दें, तो उन्हें ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति मिल जाएगी। इसके बाद राजा जगत सिंह ने श्री रघुनाथ जी की प्रतिमा लाने के लिए बाबा किशनदास के चेले दामोदर दास को अयोध्या भेजा।

 

 

2017 में अंतरराष्ट्रीय उत्सव का दर्जा

साल 1966 में दशहरा उत्सव को राज्य स्तरीय उत्सव का दर्जा दिया गया और 1970 को इस उत्सव अंतरराष्ट्रीय स्तर का दर्जा देने की घोषणा तो हुई, लेकिन मान्यता नहीं मिली। वर्ष 2017 में इसे अंतरराष्ट्रीय उत्सव का दर्जा प्राप्त हुआ है।

 

 

इस बार ये देवता करेंगे शिरकत

भगवान रघुनाथ की यात्रा में सोशल डिस्टेंसिंग के साथ सभी कारकून और देवलु मास्क पहनकर आएंगे।हिडिंबा समेत सात देवी-देवता पहुंचेंगे दशहरे मेंदशहरा उत्सव में खराहल घाटी के बिजली महादेव, राजपरिवार की दादी माता हिडिंबा, नग्गर की माता त्रिपुरा सुंदरी, खोखन के देवता आदि ब्रह्मा, पीज के जमदग्नि ऋषि, रैला के लक्ष्मी नारायण और ढालपुर के देवता वीरनाथ (गौहरी) शामिल होंगे।

 

 

मनाही के बावजूद पहुंचे धूंबल नाग

हर साल रथयात्रा के दौरान भीड़ को नियंत्रित करने का जिम्मा संभालने वाले देवता धूंबल नाग इस बार भी दशहरा में भाग लेने को लेकर अड़ गए। रविवार को देवता धूमल नाग देव चाकरी करने के लिए देवालय से कुल्लू पहुंच गए। पुलिस व प्रशासन ने उन्‍हें रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। देवता के साथ सीमित ही लोग शामिल थे। लिहाजा, जिला प्रशासन जहां सात देवी देवताओं के अलावा जिला के अन्य देवताओं से उत्सव में न आने की अपील कर रहा था। वहीं, देव धूमल नाग भी उत्सव में आने के फैसले पर अड़ गए। वह अपने हारियानों के साथ वाद्य यंत्रों की थाप के साथ ही दशहरा के लिए पहुंच गए।

 

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