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लैंप जो देता था अंधेरे से लड़ने की ताकत

लैंप जो देता था अंधेरे से लड़ने की ताकत

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कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों को देखते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को एक वीडियो संदेश जारी किया है। इस वीडियो संदेश (Video message) में उन्होंने कहा कि लॉकडाउन को पूरे 9 दिन बीत गए हैं। इन नौ दिनों में जनता ने अच्छा अनुशासन दिखाया। उन्होंने वीडियो संदेश में जनता से 5 अप्रैल को जनता से उनकी जिंदगी से रात नौ बजे 9 मिनट मांगे और कहा कि इस दिन सभी लोग घर की सभी लाइटें बंद करेंगे और घर के दरवाजे या बालकनी में खड़े रहकर नौ मिनट तक मोमबत्ती, दीया, टॉर्च या मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाएं। मकसद यह है कि चारों तरफ जब हर व्यक्ति एक-एक दीया जलाएगा तब प्रकाश की उस महाशक्ति का ऐहसास होगा, जिसमें एक ही मकसद से हम सब लड़ रहे हैं, ये उजागर होगा। इसी कड़ी को जोड़ते हुए हम अपने पाठकों के सम्मुख एक विशेष रिपोर्ट (Special Report) लेकर आ रहे हैं। इसमें लैंप का उल्लेख है जो हमें अंधेरे से लड़ने की कैसे ताकत दिखाता है। इस रिपोर्ट में हम आपको ताजमहल के रॉयल गेट पर लगे लैंप के पीछे की कहानी भी बताएंगे।


यह वह समय था जब मनुष्य ने पत्थर से आग जलाना सीख लिया था। इस आग ने मनुष्य को अंधेरे से लड़ने की जैसी ताकत दे दी थी। मनुष्य ने कई तरीके अपनी सुविधा अनुसार आग जलाना सीखी। फिर वह समय भी आया जब मिट्टी का तेल घर- घर तक पहुंचने लगा। इसी कड़ी में मनुष्य ने अंधेरे से लड़ने का एक बेहतर विकल्प खोज निकाला। यह वह विकल्प था जो उसे लंबे समय तक रोशनी देता जाता था। जी हां, हम बात कर रहे हैं लैंप की।

हैसियत के मुताबिक लैंप

लैंप में मिट्टी का तेल डाल दिया जाता था। जो रात भर जलता रहता था और मनुष्य को अंधेरे में रोशनी देता रहता था। लैंप कई प्रकार के थे। समयानुसार लैंप के स्वरुप, उसके आकार-प्रकार में अपनी सुविधानुसार समय के हर अंतराल में परिवर्तन होता रहा। ये लैंप अपनी-अपनी हैसियत के अनुरुप राजा, महाराजाओं ने कई प्रकार की धातुओं के बनवाए, जिनकी आकृतियां सबको आकर्षित करती हैं। लेकिन आम जनमानस के पास टिन वाला लैंप ज्यादा प्रचलित रहा। जब कांच की बोतल (बड़ी या छोटी) आई तो उसे भी मनुष्य ने लैंप के रूप में इस्तेमाल किया। यह पारंपरिक लैंप के न होने की दशा में बेहतर और आसान विकल्प था। इस लैंप के ढक्कन के केंद्र में एक छेद डाला जहां से धागे या कपड़े की डोरी को पिरोया जाता था। इन सभी लैंपों की डोरी कैपिलरी एक्शन प्रक्रिया के तहत तेल को ऊपर की ओर खींचती जाती थी और लैंप रोशन हुए रहता था।

पत्थर के दीपक से रोशनी की पहल

लैंप जो सबसे बाद में इस्तेमाल में आए वे लैंप का सबसे निखरा रुप था। जानकारी के अनुसार इस लैंप का इतिहास भारत में लगभग 5000 वर्ष से भी पुराना है। इसके साक्ष्य हमें मोहनजोदड़ो में खुदाई के दौरान मिले दीपों के अवशेषों से होती है। लेकिन उस समय ये लैंप ऐसे वर्तमान स्वरूप लिए नहीं थे। यह इनका प्रारंभिक चरण था। ये दीपक की तरह ही थे। पहले मनुष्य ने रोशनी के लिए पत्ते, लकड़ी आदि का इस्तेमाल किया। परंतु इसकी रोशनी को ज्यादा देर तक संभाल पाने के लिए उन्हें बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी। फिर समयानुसार इस परेशानी का हल निकाला गया पत्थर के दीपक बनाकर। पक्के पत्थर को तराश कर उसे हल्के गहरे कटोरे की तरह बनाकर उसमें चर्बी या वनस्पति तेल डालकर जलाया जाने लगा। फिर तो क्या कहने!

कदम दर कदम विकसित हुआ दीपक

उसके बाद यह दीपक हमें कदम दर कदम विकसित रूप में मिलता गया। पत्थर के साथ लकड़ी और मिट्टी आदि के दीपक बनाए गए। लकड़ी के दीपक ज्यादा कामयाब नहीं थे , इन में आग लगने का खतरा हमेशा बना रहता था। यह दीपक एक स्थान पर रखने के लिए तो सही था लेकिन यदि रोशनी के लिए इसे जलते हुए ही यहां-वहां ले जाना पड़ता तो तेल से भरे इस दीपक की संभाल बहुत मुश्किल होती थी। इसी कमी को पूरा किया मिट्टी के लैंप ने। लैंप एक बंद आकृति लिए हुए था। इसमें तेल अंदर ही सुरक्षित रहता था। इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में भी ज्यादा परेशानी नहीं होती थी। रोशनी को हर जगह पहुंचाने में इस लैंप से बहुत मदद मिलने लगी और धीरे-धीरे यह दिनचर्या का एक पक्का साथी बन गया।

वरदान से कम नहीं था लैंप

लैंप जब आया तो हर कार्य करने के लिए मनुष्य को ज्यादा समय मिला। नहीं तो रात होते ही सब कार्य रुक जाते और व्यक्तिउन कार्यों को करने के लिए सुबह का इंतजार करता रहता। पढ़ाई करने वालों के लिए तो यह एक वरदान जैसा था। लैंप को मिट्टी के तेल से ही जलाया जाता था। वैसे कड़वे तेल का भी इस्तेमाल करते थे लेकिन यह बहुत खतरनाक हो जाता था। इससे बनने वाली गैस कई बार लैंप को फााड़ देती थी। इसलिए इसका उपयोग सिर्फ खुले में रखे तेल के दीये के रूप में ही ज्यादा किया जाता था। इमरजेंसी के तौर पर ही सिर्फ इस कड़वे तेल के दीए का इस्तेमाल किया जाता था।

ताजमहल के रॉयल गेट पर लैंप

लैंप के बारे में एक रोचक जानकारी हमें आगरा के ताजमहल से भी मिलती है। इस ताजमहल के रॉयल गेट पर 111 वर्ष पुराना चार फhट लंबा ब्रास का भारी भरकम लैंप लगा है। ऐसा ही दूसरा लैंप शाहजहां और मुमताज की कब्रों के ऊपर भी लगाया गया है। इन लैंपों को अंग्रेजी शासनकाल में वायसराय लार्ड कर्जन ने वर्ष 1908 में यहां भेंट किया था। इसे कर्जन ने विशेष रुप से ताजमहल के लिए तैयार करवाया था।

चिढ़ाने के लिए ‘लंप’ का संबोधन

लैंप को स्थानीय बोली में ‘लंप’ भी कहा जाता था। यह शब्द किसी व्यक्ति को चिढ़ाने के लिए भी इस्तेमाल में लाया जाता था। यदि कोई व्यक्ति किसी बात को आसानी से बार-बार बताने पर भी न समझता तो उसे कहते, ‘यार तू भी क्या लंप है!’ वर्तमान में भी इसे इस संदर्भ में किसी को छेडऩे के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है।

इतिहास के आईने में रोशनी का सफर

लैंप के बारे में बुजुर्ग रोशन लाल कहते हैं, ‘लैंप का आना जैसे खुशियों के आने जैसा था। हम बहुत सारे कार्य इसकी रोशनी में निपटा देते थे। सबसे बड़ी बात हमारे समय के बहुत सारे पढऩे वालों के लिए तो यह एक वरदान जैसा था।’ आज लैंप बेशक उपयोग में नहीं है। आज बहुत सी आधुनिक सुविधाएं लैंप के बदले रोशनी के लिए इस्तेमाल की जा रही हैं लेकिन आज जब भी हमें यह लैंप कहीं आज नजर आ जाता है, तो हमें अतीत के उस पन्ने में ले जाता है जब आदमी ने इस हल्की-सी रोशनी के सहारे अपनी बहुत-सी परेशानियों और भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा किया था और अपनी जीवन की लड़ाइयों को जीता था।

साभार-पवन चौहान महादेव, सुंदरनगर , जिला-मंडी, हिमाचल प्रदेश
मो: 098054 02242, 094185 82242

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