कानून की भाषा: किसी अपराधी या आरोपी को पुलिस कब मार सकती है गोली, यहां जानें

जानें- एनकाउंटर के लिए किसी तरह के दिशा-निर्देश बनाए गए हैं

कानून की भाषा: किसी अपराधी या आरोपी को पुलिस कब मार सकती है गोली, यहां जानें

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नई दिल्ली। हैदराबाद में महिला पशु चिकित्सक के साथ रेप और हत्या के आरोपियों के एनकाउंटर का मुद्दा इन दिनों देश भर में गरमाया हुआ है। एक तरफ आम जन के बीच इस एनकाउंटर को लेकर खुशी छाई हुई है, तो वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग पुलिस द्वारा किए गए इस कृत्य की आलोचना भी कर रहे हैं। खैर इस एनकाउंटर की सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन यह शब्द एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। तो ऐसे में आपके लिए भी यह जानना जरूरी हो गया है कि एनकाउंटर के लिए किसी तरह के दिशा-निर्देश बनाए गए हैं? एनकाउंटर के बारे में हमारे देश का कानून क्या कहता है और किसी अपराधी या आरोपी को पुलिस कब मार सकती है गोली? तो अगर आपके मन में भी इस तरह के सवाल हैं, तो इसका जवाब आगे पढिए-


भारतीय कानून में ‘एनकाउंटर’
भारतीय संविधान के अंतर्गत ‘एनकाउंटर’ शब्द का कहीं जिक्र नहीं है। पुलिस की भाषा में इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब सुरक्षाबल/पुलिस और आरोपियों/अपराधियों के बीच हुई भिड़ंत में आरोपी या अपराधी की मौत हो जाती है।

भारतीय कानून में वैसे कहीं भी एनकाउंटर को वैध ठहराने का प्रावधान नहीं है। लेकिन कुछ ऐसे नियम-कानून जरूर हैं, जो पुलिस को यह ताकत देते हैं कि वो अपराधियों या आरोपियों पर हमला कर सकती है और उस दौरान अपराधी या आरोपी की मौत को सही ठहराया जा सकता है।

क्या और कहां हैं वो नियम/प्रावधान
आमतौर पर लगभग सभी तरह के एनकाउंटर में पुलिस आत्मरक्षा के दौरान हुई कार्रवाई का जिक्र ही करती है। आपराधिक संहिता यानी सीआरपीसी (CRPC) की धारा 46 कहती है कि अगर कोई अपराधी खुद को गिरफ्तार होने से बचाने की कोशिश करता है या पुलिस की गिरफ्त से भागने की कोशिश करता है या पुलिस पर हमला करता है तो इन हालातों में पुलिस उस अपराधी या आरोपी पर जवाबी हमला कर सकती है।

लेकिन… ये भी हैं नियम

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देश
मार्च 1997 में तत्कालीन एनएचआरसी के अध्यक्ष जस्टिस एमएन वेंकटचलैया ने सभी मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखा था। उसमें पुलिस द्वारा फर्जी एनकाउंटर्स की शिकायतों का उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा था, ‘हमारे कानून में पुलिस को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी व्यक्ति को मार दे, और जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि उन्होंने कानून के अंतर्गत किसी को मारा है तब तक वह हत्या मानी जाएगी।’ जस्टिस वेंकटचलैया साल 1993-94 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे। उन्होंने दो हालात बताए जिसमें जवाबी कार्रवाई में आरोपी या अपराधी की मौत को अपराध नहीं माना जा सकता।

क्या हैं वो दो हालात?
पहला, अगर आत्मरक्षा की कोशिश में दूसरे व्यक्ति की मौत हो जाए।

दूसरा, सीआरपीसी की धारा 46 पुलिस को बल प्रयोग करने का अधिकार देती है। इस दौरान किसी ऐसे अपराधी को गिरफ्तार करने की कोशिश, जिसने वो अपराध किया हो जिसके लिए उसे मौत की सजा या आजीवन कारावास की सजा मिल सकती है, वह पुलिस पर हमला कर भागने की कोशिश करे और इस कोशिश में पुलिस की जवाबी कार्रवाई में अपराधी या आरोपी की मौत हो जाए।

इसके अलावा एनएचआरसी ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह निर्देशित किया कि वह पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत के लिए तय नियमों का पालन करे।

क्या हैं वो नियम?
जब किसी पुलिस स्टेशन के इंचार्ज को किसी पुलिस एनकाउंटर की जानकारी प्राप्त हो तो वह इसके तुरंत रजिस्टर में दर्ज करे।

जैसे ही किसी तरह के एनकाउंटर की सूचना मिले और फिर उस पर किसी तरह की शंका जाहिर की जाए तो उसकी जांच करना जरूरी है। जांच दूसरे पुलिस स्टेशन की टीम या राज्य की सीआईडी के जरिए होनी चाहिए।

अगर जांच में पुलिस अधिकारी दोषी पाए जाते हैं तो मारे गए लोगों के परिजनों को उचित मुआवजा मिलना चाहिए।

एनकाउंटर पर क्या हैं सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश?
एनकाउंटर के दौरान हुई हत्याओं को एकस्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग भी कहा जाता है।

23 सितंबर 2014 को भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढा और जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन की बेंच ने एक फैसले के दौरान एनकाउंटर का जिक्र किया।

इस बेंच ने अपने फैसले में लिखा था कि पुलिस एनकाउंटर के दौरान हुई मौत की निष्पक्ष, प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए कुछ नियमों का पालन किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की प्रमुख बातें…
जब भी पुलिस को किसी तरह की आपराधिक गतिविधि की सूचना मिलती है, तो वह या तो लिखित में हो (विशेषकर केस डायरी की शक्ल में) या फिर किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के जरिए हो।

अगर किसी आपराधिक गतिविधि की सूचना मिलती है, या फिर पुलिस की तरफ से किसी तरह की गोलीबारी की जानकारी मिलती है और उसमें किसी की मृत्यु की सूचना आए, तो इस पर तुरंत प्रभाव से धारा 157 के तहत कोर्ट में एफआईआर दर्ज करनी चाहिए। इसमें किसी भी तरह की देरी नहीं होनी चाहिए।

इस पूरे घटनाक्रम की एक स्वतंत्र जांच सीआईडी से या दूसरे पुलिस स्टेशन के टीम से करवानी जरूरी है, जिसकी निगरानी एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी करेंगे। यह वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उस एनकाउंटर में शामिल सबसे उच्च अधिकारी से एक रैंक ऊपर होना चाहिए।

धारा 176 के अंतर्गत पुलिस फायरिंग में हुई हर एक मौत की मैजेस्ट्रियल जांच होनी चाहिए। इसकी एक रिपोर्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास भेजनी भी जरूरी है।

जब तक स्वतंत्र जांच में किसी तरह का शक पैदा नहीं होता, तब तक एनएचआरसी को जांच में शामिल करना जरूरी नहीं है। हालांकि घटनाक्रम की पूरी जानकारी बिना देरी किए एनएचआरसी या राज्य के मानवाधिकार आयोग के पास भेजना आवश्यक है।

कोर्ट का निर्देश है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत किसी भी तरह के एनकाउंटर में इन तमाम नियमों का पालन होना जरूरी है। अनुच्छेद 141 भारत के सुप्रीम कोर्ट को कोई नियम या कानून बनाने की ताकत देता है। 12 मई 2010 को भी एनएचआरसी के तत्कालीन अध्यक्ष जस्टिस जीपी माथुर ने कहा था कि पुलिस को किसी की जान लेने का अधिकार नहीं है। अपने इस नोट में एनएचआरसी ने यह भी कहा था कि बहुत से राज्यों में उनके बनाए नियमों का पालन नहीं होता है। इसके बाद एनएचआरसी ने इसमें कुछ और दिशा-निर्देश जोड़ दिए थे।

जब कभी पुलिस पर किसी तरह के गैर-इरादतन हत्या के आरोप लगे, तो उसके खिलाफ आईपीसी के तहत मामला दर्ज होना चाहिए।

घटना में मारे गए लोगों के बारे में तीन महीनें के भीतर मजिस्ट्रेट जांच होनी चाहिए।

राज्य में पुलिस की कार्रवाई के दौरान हुई मौत के सभी मामलों की रिपोर्ट 48 घंटें के भीतर एनएचआरसी को सौंपनी चाहिए। इसके तीन महीने बाद पुलिस को आयोग के पास एक रिपोर्ट भेजनी जरूरी है, जिसमें घटना की पूरी जानकारी, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, जांच रिपोर्ट और मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट शामिल होनी चाहिए।

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