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धरोहर विरासतें : कुछ संरक्षित हैं तो कुछ को सहेजना बाकी  

धरोहर विरासतें : कुछ संरक्षित हैं तो कुछ को सहेजना बाकी  

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विरासतें हमारे अतीत का गर्व हैं और हर साल 18 अप्रैल को पूरे विश्व में विरासत दिवस मनाने एक मात्र उद्देश्य यह है कि हर जगह के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक स्थलों के संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता हो। विरासतों की बात करें, तो तय है कि जिस देश का  इतिहास जितना भी गौरवशाली अतीत वाला होगा उसका स्थान उतना ही ऊंचा होगा। संसार की बहुमूल्य धरोहरों को देखते हुए उनके संरक्षण के लिए पहला विश्व विरासत दिवस ट्यूनीशिया में  इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ मान्यूमेंट्स एंड साइट्स द्वारा मनाया गया। यह दिवस हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमारे देश में कितने ही मंदिर,मस्जिद ,मकबरे, बौद्ध मठ और हस्त लिखित प्राचीन ग्रंथ हमारी बहुमूल्य विरासतें हैं। इन्हें सहेज कर रखना हमारी जिम्मेदारी है।
विश्व धरोहरें सांस्कृतिक ,ऐतिहासिक या प्राकृतिक महत्व की होती हैं । बाह्य परिचय के अतिरिक्त इनका आंतरिक महत्व भी होता है और इनको बनाए रखने के लिए खास कदम उठाए जाने की जरूरत होती है। भारत में फिलहाल 27 सांस्कृतिक 7 प्राकृतिक और मिश्रित सहित मिलाकर करीब 48  धरोहर स्थल विरासत की सूची में शामिल हो गए हैं । भारत में ऐतिहासिक महत्व की कितनी ही इमारतें और सांस्कृतिक स्थल हैं। ताजमहल, आगरा का किला अजंता-एलोरा गुफाएं नालंदा, सांची के स्तूप, चांपानेर पावागढ़ पार्क,छत्रपति शिवाजी टर्मिनस ,गोवा के प्राचीन चर्च, एलिफेंटा गुफाएं ,फतेहपुर सीकरी, चोल मंदिर, हंपी, हुमायूं का मकबरा , खजुराहो ,बोधगया,माउंटेन रेलवे, कुतुब मीनार,लाल किला ,रानी की बाव, काजीरंगा उद्यान , फूलों की घाटी,  सुंदरवन ,पश्चिमी घाट जैसी जाने कितनी विरासतें  फैली हुई हैं ।
जो संरक्षित हैं, वे तो ठीक हैं पर जिन्हें सहेजना है उन्हें चिन्हित किया जाना अभी बाकी है। दु:खद है कि एक प्राचीन भव्य अतीत होने के बावजूद हिमाचल में एक भी ऐसी धार्मिक, ऐतिहासिक या सांस्कृतिक इमारत नहीं है, जिसे विश्व विरासत में रखा जा सके। कालका रेल लाइन और ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क विश्व विरासत में शामिल हैं, पर ये इमारतें नहीं हैं। इस तरफ किए जाने वाले प्रयास भी नाकाफी रहे हैं । दो दशक पहले धरोहर गांव  घोषित किए गए परागपुर का हाल किसी से छिपा नहीं है । यहां की प्राचीन हवेलियां , इमारतें और खूबसूरत तालाब अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे हैं। यहां तक कि धरोहर गांव घोषित होने से पहले जो सुविधाएं थीं, वे भी अब नहीं हैं। इस तरह तो हम कभी अपनी विरासतों की श्रेष्ठता नहीं सिद्ध कर पाएंगे । वैसे भी अबतक जाने कितनी  लकड़ी की बनी प्राचीन इमारतें आग में जल कर खाक हो गई हैं । आगे ऐसा न हो उसके लिए  हमने क्या किया…? क्या हर मामले में हम पीछे ही रहेंगे ?

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