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नेपाल के इस मंदिर के जल में दिखता है शिव का प्रतिबिंब

नेपाल के इस मंदिर के जल में दिखता है शिव का प्रतिबिंब

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नेपाल में बूढ़ा नीलकंठ मंदिर के प्रवेश द्वार के समक्ष जल का विशाल कुंड बना हुआ है, जिसमें शेष शैया पर लेटे हुए भगवान विष्णु की चर्तुभुजी प्रतिमा है। प्रतिमा का निर्माण काले बेसाल्ट पत्थर की एक ही शिला से हुआ है। प्रतिमा का शिल्प मनमोहक एवं नयनाभिराम है। शेष शैया पर शयन कर रहे विष्णु की प्रतिमा की लम्बाई 5 मीटर है एवं जलकुंड की लम्बाई 13 मीटर बताई जाती है। शेष नाग के 11 फ़नों के विष्णु के शीश पर छत्र बना हुआ है। विष्णु के विग्रह का अलंकरण चांदी के किरीट एवं बाजूबंद से किया गया है। प्रतिमा के पैर विश्रामानंद की मुद्रा में जुड़े हुए हैं।



कहते हैं विषपान करने के पश्चात जब भगवान शिव का कंठ जलने लगा तब उन्होंने विष के प्रभाव शांत करने के लिए जल की आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक स्थान पर आकर त्रिशूल का प्रहार किया जिससे गोंसाईंकुंड झील का निर्माण हुआ। सर्वाधिक प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में से एक है गोसाईंकुंड झील जो 436 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। काठमांडू से 132 उत्तर पूर्व की ओर स्थित गोसाईंकुंड पवित्र स्थल माना जाता है। मान्यता है कि बूढा नीलकंठ में उसी गोसाईं कुंड का जल आता है, जिसका निर्माण भगवान शिव ने किया था। श्रद्धालुओं का मानना है कि सावन के महीने में विष्णु प्रतिमा के साथ भगवान शिव के विग्रह का प्रतिबिंब जल में दिखाई देता है। इसके दर्शन एक मात्र श्रावण माह में होते हैं।

बूढ़ा नीलकंठ प्रतिमा की स्थापना के विषय में स्थानीय स्तर पर दो किंवदंतियां प्रचलित हैं, पहली प्रचलित किंवदंती है कि लिच्छवियों के अधीनस्थ विष्णु गुप्त ने इस प्रतिमा का निर्माण अन्यत्र करवा कर 7वीं शताब्दी में इस स्थान पर स्थापित किया। अन्य किंवदन्ती के अनुसार एक किसान खेत की जुताई कर रहा था तभी उसके हल का फ़ाल एक पत्थर से टकराया तो वहां से रक्त निकलने लगा। जब उस भूमि को खोदा गया तो इस प्रतिमा का अनावरण हुआ। इससे बूढ़ा नीलकंठ की प्रतिमा प्राप्त हुई तथा उसे यथास्थान पर स्थापित कर दिया गया। तभी से नेपाल के निवासी बूढ़ा नीलकंठ का अर्चन-पूजन कर रहे हैं।
नेपाल के राजा वैष्णव धर्म का पालन करते थे, 12 वीं 13 वीं शताब्दी में मल्ल साम्राज्य के दौरान शिव की उपासना का चलन प्रारंभ हुआ तथा 14 वी शताब्दी में मल्ल राजा जय ने विष्णु की आराधना प्रारंभ की एवं स्वयं को विष्णु का अवतार घोषित कर दिया। 16 वीं शताब्दी में प्रताप मल्ल ने विष्णु के अवतार की परंपरा सतत जारी रखी। प्रताप मल्ल को दिखे स्वप्न के आधार पर ऐसी मान्यता एवं भय व्याप्त हो गया कि यदि राजा बूढ़ा नीलकंठ के दर्शन करेंगे लौटने पर उसकी मृत्यु अवश्यसंभावी है। इसके पश्चात किसी राजा ने बूढ़ा नीलकंठ के दर्शन नहीं किए।

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