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गिरिपार में बूढ़ी दिवाली शुरू, नाच-गाने में मशगूल लोग

गिरिपार में बूढ़ी दिवाली शुरू, नाच-गाने में मशगूल लोग

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पांवटा साहिब/नाहन। प्रदेश के सिरमौर जिला के गिरिपार क्षेत्र में प्राचीन बूढ़ी दिवाली त्योहार की धूमधाम के साथ शुरुआत हो गई। यहां बूढ़ी दिवाली का त्योहार दिवाली के ठीक एक माह बाद मार्गशीर्ष की अमावस्या से शुरू होता है। इस अवसर पर लगभग समूचा गिरिपार क्षेत्र रात भर नाचगाने और उल्लास के रंगों में डूब रहा। कबायली संस्कृति का प्रतीक बूढ़ी दिवाली अगले सात दिन तक पारपंरिक नाच-गान और दावतों के साथ मनाया जाएगा। गौर रहे कि सिरमौर जिला का गिरिपार क्षेत्र जश्न और उल्लास में डूब गया है। क्षेत्र में हर तरफ ढोल नगाड़ों की थाप और पारपंरिक गीतों की सुरलहरियों की गूंज हैं। पहाड़ी संस्कृति का सबसे अनोखा रूप बूढ़ी दिवाली के त्योहार का सेलिब्रेशन भी शुरू हो गया है।

सिरमौर के साथ शिमला, किन्नौर और सोलन से भी आते हैं लोग

सिरमौर जिला का गिरिपार क्षेत्र में यह त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। इसके अलावा शिमला, सोलन व किन्नौर जिला के कुछ दूरदराज क्षेत्रों सहित पड़ोसी राज्य उत्तराखंड के हिमाचल से लगते क्षेत्रों में भी इस त्याहोर की धूम रहती है। बूढ़ी दिवाली त्योहार क्यों मनाया जाता है इसका स्पष्ट वृतांत तो कहीं नहीं मिलता, मगर प्रचलित मान्यता के अनुसार यह अनोखा भगवान श्रीराम जी के अयोध्या लौटने और उनके राजतिलक की खुशी में मनाया जाता है। त्योहार की शुरुआत मार्गशीर्ष की अमावस्या से होती है। अमावस्या में जहां घर की महिलाएं पारपंरिक व्यंजन तैयार करती हैं, वहीं, अन्य लोग गांव को बुरी शक्तियों से सुरक्षित रखने के लिए मशाल यात्रा की तैयारी करते हैं। शाम की दावत के लिए उडद की पिष्ठी से बनी रोटियां परोसी जाती हैं, जिन्हें बडौली कहा जाता है।

एकजुट होकर नाचते हैं लोग

वहीं, शाम की दावत के बाद गांव के युवा एकत्र हो कर नाच गाने के साथ गांव में मशाल यात्रा निकलते हैं। इस यात्रा का समापन गांव के बाहर राजा रावण के प्रतीक स्वरूप बलराज का दहन कर किया जाता है। धारणा यह भी है कि अमावस्या की रात मशाल यात्रा से क्षेत्र से सभी बुरी शक्तियां भाग जाती है और फसलें अच्छी पैदा होती है। सिरमौर जिला के दूरदराज पोका गांव में बूढ़ी दिवाली के उपलक्ष्य में सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में चंडीगढ़ की मेयर आशा जैसवाल ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की। मेयर आशा जैसवाल ने प्राचीन संस्कृति के संरक्षण के लिए दूरदराज क्षेत्र के युवाओं के प्रयासों की सराहना की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि संस्कृति के संरक्षण का जिम्मा युवाओं के कंधों पर है, लेकिन इसके लिए सरकारी स्तर पर भी सार्थक प्रयासों की जरूरत है।

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