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गुलखेड़ी गांव, जहां बिकता है बचपन

गुलखेड़ी गांव, जहां बिकता है बचपन

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child trafficking: खुलेआम बच्चों को दी जाती है चोरी आैर जुए की ट्रेनिंग

नई दिल्ली। दिल्ली में चोरी के कई मामले सामने आते रहते हैं।  जब हम पुलिस में रिर्पोट दर्ज करवाते हैं तो बस यही सुनने को मिलता है कि मामले की तफ्तीश  की जाएगी। लेकिन होता कुछ भी नहीं। आज हम आपको बताते हैं, कि आखिर कहानी का पूरा सच है क्या। यह एक ऐसा सच है जो देश को सोचने पर मजबूर कर देगा। क्योंकि मामला सिर्फ मुट्ठी भर चोरों का नहीं है। बल्कि हिंदुस्तान के बचपन और उस बचपन के भविष्य की चोरी का है। दिल्ली से महज 700 किलोमीटर की दूरी पर एक इलाका गुलखेड़ी गांव है, जहां बच्चों को बाकायदा चोरी आैर जुए की ट्रेनिंग दी जाती है। यहां ट्रेनिंग के लिए कैंप भी चलाए जाते हैं।

child trafficking: लाखों में बिकते हैं बच्चे 

बच्चों से चोरी करवाने के लिए, एक पूरी गैंग काम करती है। चोरी करने वाले बच्चों को लाखों में बेचा जाता है। फिर उन बच्चों को चोरी की ट्रेनिंग  दी जाती है। देश में कोई भी ऐसी स्टेट नहीं बची होगी, जहां इन बच्चों ने चोरी नहीं की हो। बच्चों का सौदा लाखों रुपये में होता है या फिर चोरी के माल में आधा हिस्सा इनकी कीमत होती है।


बच्चों से चोरी कराने के फायदे

इन शातिरों को बच्चों से चोरी कराने में कई फायदे होते हैं। तो बस गिनते जाइये उन फायदों को जो इस गैंग को नन्हें बच्चे करा सकते हैं। बच्चों के लिए किसी भी पार्टी में घुसना आसान होता है। ये महिलाओं में आसानी से शामिल हो जाते हैं। बच्चों के लिए चोरी करना भी आसान होता है। किसी को बच्चों पर शक भी नहीं होता। पकड़े जाने पर बच्चे पिटने से बच जाते हैं। बाल अपराधियों का कानून भी बेहद उदार है।

दर्ज हैं कई मामले

दो महीने पहले दिल्ली पुलिस के हाथ पांच आरोपी लगे थे। इन्हीं से पूछताछ में यह खुलासा हुआ कि एमपी के राजगढ़ के गुलखेड़ी गांव से ऑपरेट होने वाला यह गैंग दरअसल ऑल इंडिया लेवल का है और इनकी एक्टीविटी इतनी तेज है कि सिर्फ कुछ महीनों में ही एनसीआर में इस गैंग ने कई दर्जन वारदातों को अंजाम दे डाला। 15 वारदातें तो ऐसी हैं जिनकी एफआईआर दर्ज हैं।

गुलखेड़ी गांव में नाकाम है कानून

पुलिस सब जानती है, कि ये बच्चे कहां से आए हैं। इन्हें किसने ट्रेनिंग दी है और गैंग कौन चला रहा है। मगर फिर भी पुलिस गुलखेड़ी जाकर बेबस हो जाती है। दरअसल, थाने के आंकड़े बताते हैं कि करीब 5 दर्जन वारंट यहां महीनों से पड़े हुए हैं, जिनकी तामील तक नहीं हुई और देश की शायद ही किसी सूबे की पुलिस हो जो यहां आरोपियों को पकड़ने के लिए न आई हो मगर जितनी गर्मजोशी से वह यहां आती है। उतनी ही मायूस होकर खाली हाथ लौट जाती है।  पता नहीं ऐसा क्या हो जाता है कि गुलखेड़ी की चौखट पर कदम रखने के बाद अदालती फरमान नाकाम और कानून बेबस होकर रह जाता है।

ग्रामीणों से पिट कर आती है पुलिस

ग्रामीण का कहना है कि पुलिस क्या कर लेगी। पुलिस कुछ नहीं कर सकती । पुलिस को तो पीट कर ही भगा देते हैं। पुलिस को कई बार मार कर भगा भी चुके हैं। यहां पुलिस नहीं आती, यहां पुलिस  की धमकी नहीं चलती। जब उनसे कहा गया, कि यह गैरकानूनी काम है तो उनका जवाब था, कि गैरकानूनी है तो कौन देख रहा है। क्या कर लेगा कोई।

अपराधियों के लिए जन्नत है गांव

जुर्म यहां खुले में पसरता है। आरोपी बेफिक्र हैं। किसी की मजाल नहीं है, जो इन पर नकेल कस सके। पुलिस का हाल तो आप देख ही चुके हैं। मगर फिर भी मजबूरी हो तो गांव में घुसने के लिए पूरे दल-बल की तैयारी करती है। लेकिन जब यहां के एसएचओ का हाल बुरा है तो आप समझ सकते हैं कि दूसरे राज्यों से आने वाली पुलिस के हाथ यहां कुछ क्यों नहीं लगता होगा।

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