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चांदी के रुपए…

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Children’s story  Silver coin धान्या घर में सबसे छोटी थी …दिन भर खेलने में व्यस्त रहती थी। उसके पापा को फूलों के बीच रहने का शौक था। इसलिए उन्होंने घर से थोड़ी दूर पर एक बेहद सुंदर कॉटेज बनवा रखी थी। धान्या दिन भर उसी कॉटेज के आसपास खेला करती। उसके हमजोली दोस्त लड़कियां नहीं, लड़के होते थे। घर में एक पुरानी चलन का ग्रामोफोन था। दोपहर को सभी इकट्ठे होते, तब पुराने रिकार्डों में से एक गाना तलाश किया जाता। सुई सेट होते ही एक प्यारी सी आवाज में गीत सुनाई देता —अमुवा की डारी पर बोले री कोयलिया। ये शरारतें तब होतीं, जब घर के लोग गरमी से बेहाल हो ठंडे कमरे में सो जाते थे। छुट्टियां आईं तो बच्चों को अखबार निकालने का शौक पैदा हो गया। बच्चे दिन भर खबरें इकट्ठी करते और शाम तक अखबार लिखकर तैयार हो जाते। खबरें भी कैसी-कैसी कि गुट्टू स्कूल न जाकर दिनभर खेलता रहा, सरिता को न पढ़ने के लिए डांट पड़ी और चंदन ने गिर कर अपने आपको जख्मी कर लिया। काफी दिनों तक बच्चे अखबार के रिपोर्टर बने रहे और यह खेल चलता रहा। 

 Children’s story  Silver coin: धान्या को अपने घर से अच्छी, पापा की कॉटेज लगती थी। पापा लोअर कोर्ट के मैजिस्ट्रेट थे और देर रात तक काम करते रहते थे। जब भी रात होती तो उस कॉटेज के अंदर मेज पर रखे लैंप की तेज रोशनी खिड़कियों की झिरी से छन कर बाहर आती रहती और धान्या तब चुपचाप सबसे ऊपर वाले कमरे की खिड़की में बैठी उसे देखा करती।  इसी बीच एक दिन धान्या की मां उसके लिए नई चप्पलें खरीद कर लाईं। बिल्कुल नई चप्पलें पाकर धान्या बहुत खुश थी। वह पूरे आंगन में बाहें फैलाए गोल-गोल घूम रही थी, तभी पापा उसके पास आ गए।
-धान्या तूने कभी रानी देखी है ?
-नहीं तो रानी कैसी होती है…?
-कल तुम्हें दिखाएंगे मेरा दोस्त गाड़ी लेकर आएगा फिर तुम्हें ले चलेंगे।
– वो डॉक्टर मुन्नू…धान्या खिलखिलाई।
-ऐसा नहीं कहते… कहकर पापा बाहर चले गए।
दूसरे दिन धान्या डाक्टर मुन्नू की गाड़ी में बैठ कर पापा के साथ गई। वह एक पीले रंग की तेज रफ्तार गाड़ी थी, सो धान्या को बड़ा मजा आया। कुछ देर बाद वे एक बहुत बड़े गेट के पास पहुंचे, जिसके दोनों ओर शेर बने हुए थे।
पापा तो कई लोगों के साथ बाईं तरफ के हॉल में चले गए और धान्या को दो नौकरानियां अंदर ले गईं। कई दालानें पार करके उसे एक सजे हुए कमरे में पहुंचा दिया गया।

उसने सुन रखा था कि रानियां बहुत सुंदर होती हैं…हीरे मोतियों से सजी एकदम परियों की तरह। पर उसके सामने जो महिला आई उसने लेमन कलर की सिल्क साड़ी पहन रखी थी। गले में सफेद मोतियों की माला और कानों में नौरत्नी टॉप्स।
-आप रानी हैं…?
-हां क्यों…?
मैंने सुना था रानी एकदम सजी होती हैं परियों की तरह।
-क्या मैं सुंदर नहीं….वे हंस दीं। सुनिए किस्से कहानियों का जमाना चला गया, अब आपको हर जगह मेरे जैसी ही रानियां देखने को मिलेंगी।

वह एक बड़ी सी छत थी जहां वे बैठी धान्या से बातें कर रही थीं। डूबते सूरज की रोशनी मोतियों पर पड़ते ही सतरंगी आभा से उनका चेहरा दमक उठता था। धान्या के सामने मिठाई की प्लेट थी पर वह उनका चेहरा देखे जा रही थी। चलते वक्त उन्होंने धान्या की हथेलियों में पांच-पांच चांदी के सिक्के रख मुट्ठी बंद कर दी थी।
सीढ़ियों से उतरते वक्त पापा की नजर धान्या की बंद मुट्ठियों पर गई। हथेली खोल कर देखते ही उनकी त्योरियां चढ़ गईं ।
-कहां से मिले…?
-रानी जी ने दिए
-इन्हें वापस देकर आओ …उन्होंने सख्ती से कहा।और धान्या वापस मुड़ गई।
धान्या को वापस आते देख वे हंस दीं सिक्के वापस लेते हुए उनके चेहरे पर उदासी थी।
-तुम जानती हो मैंने सिक्के वापस क्यों करवाए…? इसलिए कि यह एक बड़ी जायदाद का मामला था कोई और होता तो इसी काम के लाखों ले लेता पर मैंने कुछ नहीं लिया फिर ये चांदी के रुपए कैसे ले लेता।

बात धान्या की समझ में आ गई इस लिए उसके मन का तनाव निकल गया । वह समझ गई थी तस्वीरों की रानी से असली रानी फर्क होती हैं और जिस जायदाद के कागज पर दस्तखत करने के लिए पापा ने कुछ नहीं लिए थे। ऐसी जगह पर धान्या को किसी से कुछ नहीं लेना था।

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