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ठंड से बचाने वाली चाय, और भी कई मायनों में है मददगार पढ़ेंगे तो चलेगा पता

ठंड से बचाने वाली चाय, और भी कई मायनों में है मददगार पढ़ेंगे तो चलेगा पता

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रिकांगपियो। सर्दियों के दिनों में ठंड से बचाने वाली चाय और कहीं नहीं बल्कि हिमाचल प्रदेश में ही पाई जाती है। ये ऐसी चाय है जो औषधीय गुणों से पूरी तरह से भरपूर है। किन्नौरी चाय कहते हैं इसे,इसकी पत्ती किन्नौर की पहाड़ियों पर करीब 15 से 18 हजार फीट की ऊंचाई पर मिलती हैए जिसे लेने के लिए लोगों को वर्ष में एक बार पहाड़ियों पर जाना पड़ता है। किन्नौर में अधिकतर लोग किन्नौरी चाय ही पीते हैं। यहां की मेहमान नवाजी किन्नौरी चाय से ही शुरु होती है। यहां की नमकीन किन्नौरी चाय ठंड से तो बचाती ही है साथ ही शरीर में पानी की कमी पूरी करती है, गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य को ठीक रखती है। इतना ही नहीं बुजुर्गों को हड्डियों का दर्द नहीं होने देती, पहाड़ों में चढ़ने से थकावट का एहसास नहीं होने देती,शरीर में खून की सफाई के लिए लाभदायक रहती है साथ ही शूगर लेवल ठीक रखने में भी मददगार होती है। इस चाय को पीकर चलते हुए रास्ते में थकावट नहीं होती।

सर्दियों में भारत-चीन सीमा पर तैनात जवान भी इस चाय का उपयोग करते हैं। शरीर को गर्म रखने व ऊंचाई पर चढ़ते हुए थकावट ना हो इसी कारण सेना के जवान किन्नौरी चाय का सेवन करते हैं। नमकीन चाय को बनाने की विधि थोड़ी अलग है। इस चाय को मिट्टी के चूल्हे पर बनाया जाता है। सबसे पहले आम चाय की तरह गर्म पानी किया जाता है, इसके बाद पहाड़ों से निकाली गई प्राकृतिक शिंग चा यानी पहाड़ों में पाई जाने वाली लकड़ी चाय को एक स्पेशल कपड़े में बांधकर पानी के बर्तन रखा जाता है, जब तक इसमें एक विशेष रंग न आ जाएए फिर इसे करीब आधा घंटा तक उबाला जाता है। इसके बाद इस चाय पत्ती के कपड़े को बाहर निकाला जाता है और फिर पानी को उबलने दिया जाता है। चाय में डलने वाली सामग्री को तैयार किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से अखरोट, गाय का दूध, किन्नौरी मक्खन और अन्य सूखे मेवों को पीसकर स्पेशल किन्नौरी धूप की लकड़ी से बने एक लंबे बर्तन में एक साथ चढ़ाया जाता है और करीब 15 मिनट लंबी लकड़ी से हिलाकर सामग्री को मिलाया जाता है। जब इस बर्तन से चाय की सामग्री की खुशबू आने लगती है तो चाय को बर्तन में डालकर हिलाया जाता है और अंत में लकड़ी के लंबे बर्तन से चाय के पतीले में नमकीन चाय को डाला जाता है। इसे खूब उबाला जाता है। जब तक इसकी खुशबू पूरे घर में ना फैल जाए।


इसकी उत्पति किन्नौर व तिब्बत से हुई, ये बात उस समय की है जब सैकड़ों वर्ष पूर्व किन्नौर व तिब्बत के व्यापारिक रिश्ते काफी अच्छे हुआ करते थे। किन्नौर के लोग यहां से अनाज तिब्बत ले जाते थे और वहां से नमक किन्नौर लेकर आते थे। चूंकि तिब्बत में अनाज की कमी होती थी और किन्नौर में नमक की कमी होती थीए तिब्बत में लकड़ी की चाय पत्ती नहीं होती थी और इसलिए तिब्बत के लोग इसे किन्नौर से तिब्बत ले जाते थे। इस लकड़ी को किन्नौर में शिंग चा कहते हैं।

 

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