महाशिवरात्रि पर काठगढ़ में उमड़ता है भक्तों का सैलाब, होता है अर्धनारीश्वर मिलन

महाशिवरात्रि पर काठगढ़ में उमड़ता है भक्तों का सैलाब, होता है अर्धनारीश्वर मिलन

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रविन्द्र चौधरी/इंदौरा। हिमालय के आंचल में बसा हिमाचल प्रदेश अपनी अलौकिक एवं मनोहारी धरती के कारण आदिकाल से ही देवी-देवताओं की प्रिय तपस्थली रहा है। इसी देव संस्कृति की वजह से हिमाचल को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है। देवभूमि की ऐसी ऐतिहासिक एवं समृद्ध सांस्कृतिक गौरवशाली पृष्ठभूमि को समेटे, कांगड़ा जिला (Kangra District) आरंभ से ही धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। इसकी मान्यताएं, धारणाएं एवं परंपराएं आदिकाल से ही जनमानस में अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। शिव महापुराण के अनुसार शिव भगवान ही एकमात्र ऐसे देवता हैं, जो निराकार एवं सकल दोनों हैं। यही कारण है कि शिव भगवान का पूजन, लिंग एवं मूर्ति दोनों में समान रूप से किया जाता है।

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जिला के इन्दौरा (Indora) उपमंडल मुख्यालय से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित शिव मंदिर, काठगढ़ (Shiv Temple, Kathgarh) का अपना अलग माहात्म्य है। शिवरात्रि के महापर्व पर इस मंदिर में प्रदेश के अलावा सीमांत राज्यों, पंजाब एवं हरियाणा से भी असंख्य श्रद्धालु विशेष रूप से आते हैं। इस बार यहां पर जिला स्तरीय शिवरात्रि महोत्सव का आयोजन 3 से 5 मार्च तक किया जा रहा है।

 

पर्यटन की दृष्टि से यह स्थान अति महत्वपूर्ण बन गया है। वर्ष 1986 से पहले, यहां केवल शिवरात्रि महोत्सव ही मनाया जाता था। अब शिवरात्रि के साथ-साथ रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, श्रावण मास महोत्सव, शरद नवरात्रि तथा अन्य सभी धार्मिक समारोह आयोजित किए जाते हैं।

 

इस मंदिर का इतिहास कई दंत कथाओं एवं किंवदंतिओं से जुड़ा हुआ है। शिव पुराण में वर्णित कथानुसार श्रीब्रह्म तथा श्रीविष्णु के मध्य अपने बड़प्पन को लेकर विभिन्न अस्त्रों-शस्त्रों के साथ भयानक युद्ध हुआ था। भगवान शिव आकाश मंडल से कौतुहलवश यह युद्ध देख रहे थे। दोनों एक दूसरे के वध की इच्छा से महेश्वर और पाशुपात अस्त्र का प्रयोग करने में प्रयासरत थे; लेकिन इनके प्रयोग से त्रैलोक्य भस्म हो सकता था। संभावित महाप्रलय को देखकर भगवान शंकर से नहीं रहा गया। इस युद्ध को शांत करवाने के लिए भगवान शिव को महाग्नि तुल्य स्तंभ के रूप में, उन दोनों के सामने प्रकट होना पड़ा। इसी महाग्नि तुल्य स्तंभ को काठगढ़ स्थित महादेव का विराजमान शिवलिंग माना जाता है। इसे अर्धनारीश्वर शिवलिंग भी कहा जाता है।

आदिकाल से स्वयंभू प्रकट, सात फुट से अधिक ऊंचा, 6 फुट 3 इंच की परिधि में भूरे रंग के रेतीले पाषाण रूप में, यह शिवलिंग व्यास दरिया तथा छौंछ खड्ड के संगम स्थान के दाईं ओर टीले पर विराजमान है। यह शिवलिंग दो भागों में विभाजित है। छोटे भाग को मां पार्वती तथा ऊंचे भाग को भगवान शिव (Lord Shiva) का रूप माना जाता है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार मां पार्वती और भगवान शिव के इस अर्धनारीश्वर के मध्य का हिस्सा नक्षत्रों के अनुरूप घटता-बढ़ता रहता है और शिवरात्रि पर दोनों का मिलन हो जाता है।

शिवलिंग के रूप में पूजे जाने वाले शिवलिंग की ऊंचाई लगभग 7-8 फुट है; जबकि पार्वती के रूप में आराध्य हिस्सा 5-6 फुट ऊंचा है। यह पावन शिवलिंग अष्टकोणीय तथा काले-भूरे रंग का है। वर्तमान में इस मंदिर की पूजा का ज़िम्मा महन्त काली दास तथा उनके परिवार के पास है, जबकि वर्ष 1998 से पूर्व उनके पिता स्वर्गीय महन्त माधो नाथ के पास इस मंदिर की पूजा का उत्तरदायित्व था।

मंदिर के उत्थान के लिए वर्ष 1984 में प्राचीन शिव मंदिर प्रबंधकारिणी सभा, काठगढ़ का गठन किया गया। सन् 1986 में इस सभा का पंजीकरण होने के बाद मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए कई विकास कार्य आरंभ किए गए। सभा के सदस्यों की कड़ी मेहनत और लगन तथा लोगों के योगदान से सभा द्वारा वर्ष 1995 में प्राचीन शिव मंदिर के दायीं ओर भव्य श्री राम दरबार मंदिर का निर्माण करवाया गया।

मंदिर कमेटी का वर्तमान में जिम्मा संभाल रहे प्रधान ओम प्रकाश कटोच बताते हैं कि श्रद्धालुओं की दिन-प्रतिदिन बढ़ती संख्या को देखते हुए कमेटी ने दो बडे़ लंगर हॉल, दो बड़ी सराएं, एक भव्य सुंदर पार्क, पेयजल की व्यवस्था तथा सुलभ शौचालयों का निर्माण करवाया है। इसके अतिरिक्त सरकार तथा लोगों की सहभागिता से कमेटी द्वारा निर्माण कार्य निरंतर जारी हैं। मंदिर में आने वाले श्रद्वालुओं की सुविधा के लिए कमेटी प्रतिदिन तीन बार निःशुल्क लंगर की व्यवस्था उपलब्ध करवा रही है। इसके अलावा कमेटी समय-समय पर निःशुल्क चिकित्सा शिविरों का आयोजन भी करवा रही है।

मंदिर कमेटी ने वर्ष 2011 में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से संबद्धता के उपरांत मंदिर में संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना की, जिसमें प्राक्शास्त्री तथा शास्त्री की कक्षाएं चलाई जा रहीं हैं। कमेटी धार्मिक एवं सामाजिक कार्यों के अतिरिक्त प्रति वर्ष जनवरी माह में मेधावी छात्रवृति प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन भी करवाती है। इसके अतिरिक्त गरीब बच्चों की पढ़ाई तथा गरीब परिवारों की लड़कियों की शादी का खर्च भी सभा अपने स्तर पर वहन करती है।

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