नहीं जान पा रहे छोटे बच्चे की बीमारी की वजह, “कुमार तंत्र” देगा हल

नहीं जान पा रहे छोटे बच्चे की बीमारी की वजह, “कुमार तंत्र” देगा हल

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बच्चे संभालना किसी चुनौती से कम नहीं खासकर बच्चे जब छोटे होते हैं तो ज्यादा चिंता होती है। छोटे बच्चे अगर बीमार हो जाएं तो सिर्फ उसे ही पीड़ा नहीं होती, बल्कि उसके साथ घर के अन्य सदस्य भी परेशान हो जाते हैं। हालांकि बच्चों का बीमार होना कोई विशेष बात नहीं होती, परंतु एक निश्चित अंतराल के बाद ही बीमार पड़ना अवश्य ही चिंता की बात होती है। छोटा बच्चा कई बार किसी निश्चित समय पर निश्चित अंतराल के बाद बिना किसी कारण से रोता है, चिल्लाता है और बीमार पड़ता है। इसका सही हल डॉक्टर (Doctor) भी नहीं दे पाते हैं। बच्चे के माता-पिता परेशान होते हैं और विविध प्रकार के उपचार करते हैं, फिर भी समस्या का हल नहीं मिलता।


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इस विषय में एक प्राचीन ग्रंथ हैं, जिसे लंकापति रावण ने रचा है। इस ग्रंथ का नाम है “कुमार तंत्र”। इसमें बालक के चिकित्सा (Medical) संबंधी जानकारियां मिलती हैं। इस ग्रंथ के अनुसार 12 अलग-अलग मातृका होती हैं जो शिशु पर प्रभाव डालती हैं। इस मातृकाओं के कारण 12 वर्ष तक बालक को पीड़ा होती है। ये कौन सी मातृकाएं हैं और ये शिशु को किस प्रकार परेशान करती हैं इसके बारे में हम आपको बताते हैं।

नंदना मातृका : ये शिशु को प्रथम दिन, प्रथम माह या प्रथम वर्ष में पीड़ित करती है। इसके प्रभाव से बालक माता का दूध नहीं पीता और निरंतर रोता रहता है।

सुनंदना मातृका : जन्म के दूसरे दिन, दूसरे माह, दूसरे वर्ष सुनंदना मातृका पीड़ित करती है, जिससे बालक सोता नहीं हैं, शरीर में कंपन होता है और वह दूध नहीं पीता।

पूतना मातृका : जन्म के तीसरे दिन, तीसरे माह, तीसरे वर्ष में बालक को पीड़ा देती है। इसके प्रभाव से बालक ऊपर की ओर टकटकी लगाकर देखता है और मुट्ठियां बांधकर चिल्लाता है।

मुखमुंडिका मातृका : ये मातृका के तहत शिशु जन्म के चौथे दिन, चौथे माह, चौथे वर्ष में बालक गर्दन झुकाए रहता है और ज्वर आदि से पीड़ित रहता है।

कंठपूतना मातृका : जन्म से पांचवे दिन, पांचवे माह तथा पांचवे वर्ष में ये पीड़ा देती है इससे बालक ज्वर से पीड़ित होकर कांपने लगता है और उसकी मुट्ठिया बंधी रहती हैं।

शकुनिका मातृका : जन्म से छठवें दिन, छठवें माह तथा छठवें वर्ष में पीड़ा देती है। बालक ज्वर से पीड़ित होता है, उसे नींद नहीं आती और ऊपर देखता है।

शुष्करेवती मातृका : यह जन्म के सातवें दिन, सातवें माह और सातवें वर्ष ये पीड़ा देती है। बालक को बुखार, शरीर में कंपन और निरंतर रोना चलता है।

अर्यका मातृका : जन्म से आठवें दिन, आठवें माह, आठवें वर्ष में ये पीड़ा देती हैं। इससे बालक भोजन नहीं करता, शरीर में दुर्गध आती हैं ज्वर से पीड़ित होता है।

भूसूतिका मातृका : जन्म से नौवे में दिन, नौवे माह, नौवे वर्ष में पीड़ा देती है। इसके प्रभाव से बालक को बुखार ठंड अधिक लगती है और शरीर दर्द करता है।

निऋता मातृका : जन्म से दसवें दिन, दसवें माह, दसवें वर्ष में पीड़ा देती हैं। बालक मल मूत्र से जुड़े दोष से पीड़ित रहता है, शरीर में कंपन होता है।

पिलिपिच्छिका मातृका : यह जन्म से ग्यारहवें दिन, ग्यारहवें माह, ग्यारहवें वर्ष में परेशान करती है, बालक भोजन नहीं करता।

कामृका मातृका : जन्म से बारहवें दिन, बारहवें माह, बारहवें वर्ष में पीड़ा देता है, बालक हंस हंसकर रोता है हाथ पैर फेंकता है। खाना नहीं खाता है।


पीड़ामुक्त होने के कुछ उपाय :

यदि बालक निरंतर रोता रहे या कुछ भी नहीं खाए तो बालक के रहने के स्थान पर गूगल की धूनी देनी चाहिए।

यदि बालक बिल्कुल शांत रहे, छत या आकाश की ओर देखे तो सफेद चंदन की लकड़ी को बालक के शयन कक्ष में इस प्रकार लटका दें जिससे कक्ष में प्रवेश करने वाले व्यक्ति की दृष्टि उस लकड़ी पर पड़े।

पीली सरसों, दो पीपल के पत्ते, पीले फूल, हल्दी गांठ इन सभी को पीले वस्त्र में बांधकर उस कक्ष में एक रात के लिए रख दें जहां बालक रहता हो। प्रातः काल बालक के ऊपर से पोटली को घुमाकर बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। पोटली को ऊपर से घुमाते समय पोटली को खोलकर नहीं देखना चाहिए। अलग-अलग मातृकाओं के अनुसार पोटली को निश्चित संख्या में पीड़ित बालक के ऊपर से घुमाना चाहिए। जैसे नंदना मातृका के लिए 5 बार तो सुनंदना के लिए 11 बार घुमाना चाहिए।

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