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जानिए क्या है राधाष्टमी पर्व का महत्व व विशेषता

जानिए क्या है राधाष्टमी पर्व का महत्व व विशेषता

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भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को श्रीकृष्ण की बाल सहचरी, जगजननी राधाजी का जन्म हुआ। राधा के बिना श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व अपूर्ण है। श्री कृष्ण जन्माष्टमी के करीब 15 दिनों बाद राधाष्टमी आती है। ऐसा कहा जाता है कि जो राधाष्टमी का व्रत नहीं रखता, उसे जन्माष्टमी व्रत का फल नहीं मिलता। राधाष्टमी के दिन श्रद्धालु बरसाना की ऊंची पहाडी़ पर स्थित गहवर वन की परिक्रमा करते हैं। इस दिन बरसाना में बहुत ही रौनक रहती है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से व्रती को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। यदि श्रीकृष्ण के साथ से राधा को हटा दिया जाए तो श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व माधुर्यहीन हो जाता। राधा के ही कारण श्रीकृष्ण रासेश्वर हैं। राधाजी कृष्ण की प्रेयसी है। राधाजी कृष्ण के वक्ष स्थल पर विराजमान है।


राधाष्टमी पर पूजन विधि

ज्योतिर्विद प. दयानन्द शास्त्री के अनुसार राधाष्टमी के दिन शुद्ध मन से व्रत का पालन किया जाता है। राधाजी की सोने या किसी अन्य धातु से बनी हुई सुंदर मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराने के पश्चात उनका श्रृंगार किया जाता है। मध्यान्ह के समय श्रद्धा तथा भक्ति से राधाजी की आराधना कि जाती है। धूप-दीप आदि से आरती करने के बाद अंत में भोग लगाया जाता है। कई ग्रंथों में राधाष्टमी के दिन राधा-कृष्ण की संयुक्त रुप से पूजा की बात कही गई है।

इसके अनुसार सबसे पहले राधाजी को पंचामृत से स्नान कराना चाहिए और उनका विधिवत रुप से श्रृंगार करना चाहिए। इस दिन मंदिरों में 27 पेड़ों की पत्तियों और 27 ही कुंओं का जल इकठ्ठा करते हैं , सवा मन दूध, दही, शुद्ध घी तथा बूरा और औषधियों से मूल शांति कराते है। अंत में कई मन पंचामृत से वैदिक मंत्रों के साथ “श्यामाश्याम” का अभिषेक किया जाता है. नारद पुराण के अनुसार ‘राधाष्टमी’ का व्रत करने वाले भक्तगण ब्रज के दुर्लभ रहस्य को जान लेते हैं। जो व्यक्ति इस व्रत को विधिवत तरीके से करते हैं वह सभी पापों से मुक्ति पाते हैं।

जानिए ब्रज और बरसाना में कैसे मानते हैं पर्व

ब्रज और बरसाना में जन्माष्टमी की तरह राधाष्टमी भी एक बड़े त्योहार के रूप में मनाई जाती है। वृंदावन में भी यह उत्सव बडे़ ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। मथुरा, वृन्दावन, बरसाना, रावल और मांट के राधा रानी मंदिरों इस दिन को उत्सव के रुप में मनाया जाता है। वृन्दावन के ‘राधा बल्लभ मंदिर’ में राधा जन्म की खुशी में गोस्वामी समाज के लोग भक्ति में झूम उठते हैं। मंदिर का परिसर “राधा प्यारी ने जन्म लिया है, कुंवर किशोरी ने जन्म लिया है” के सामूहिक स्वरों से गूंज उठता है। मंदिर में बनी हौदियों में हल्दी मिश्रित दही को इकठ्ठा किया जाता है और इस हल्दी मिली दही को गोस्वामियों पर उड़ेला जाता है। इस पर वह और अधिक झूमने लगते हैं और नृत्य करने लगते हैं। राधाजी के भोग के लिए मंदिर के पट बंद होने के बाद, बधाई गायन के होता है। इसके बाद दर्शन खुलते ही दधिकाना शुरु हो जाता है। इसका समापन आरती के बाद होता है।

जानिए राधाष्टमी की विशेषता

  • वेदों, पुराणों और शास्त्रों में राधाजी को कृष्ण वल्लभा कहकर गुणगान किया गया है।
  • राधा जी का जाप और स्मरण करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • राधा अष्टमी का व्रत करने से इंसान की हर मनोकामना पूरी होती है।
  • राधाष्टमी की कथा सुनने मात्र से व्रती और भक्त सुख, धन और सर्वगुण सम्पन्न बनता है।
  • राधा की पूजा किये बिना श्रीकृष्ण की पूजा अधूरी मानी जाती है।
  • मथुरा, वृन्दावन, बरसाना, रावल और मांट के राधा रानी मंदिरों में इस दिन को त्योहार के रूप में मानते है।
  • पं. दयानन्द शास्त्री ने बताया कि भविष्य पुराण और गर्ग संहिता के अनुसार, द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण पृथ्वी पर अवतरित हुए, तब भाद्रपद महीने में शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन महाराज वृषभानु की पत्नी कीर्ति के गर्भ से राधाजी अवतरित हुई थी। तब से भाद्रपद शुक्ल अष्टमी राधाष्टमी के नाम से प्रसिद्ध हो गई।
  • नारद पुराण के मुताबिक, ‘राधाष्टमी’ का व्रत करने वाले भक्तों को ब्रज के दुर्लभ रहस्य के बारे में पता चल जाता है। राधा और कृष्ण को युगल सरकार की संज्ञा दी गई है।

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