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राधा के बिना अधूरा कृष्ण का नाम

राधा के बिना अधूरा कृष्ण का नाम

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जब कृष्ण बालपन में ही थे तभी गोकुल छोड़कर मथुरा आ गए थे। गोकुल से मथुरा की दूरी कुछ मीलों की है किंतु वह कभी वापस नहीं लौटे। उसका आगमन था कि भारतीय राजनीती में भूचाल आ गया। अजेय समझे जाने वाले प्रजापीड़क मथुरानरेश का वध हो गया और सत्ता फिर वृद्ध नरेश उग्रसेन के हाथ में आ गई। कृष्ण एक बहुत नटखट बालक हैं। वह एक बांसुरी वादक हैं और बहुत अच्छा नाचते भी हैं। वह अपने दुश्मनों के लिए भयंकर योद्धा हैं। कृष्ण एक ऐसे अवतार हैं, जिनसे प्रेम करने वाले हर घर में मौजूद हैं। वह एक चतुर राजनेता और महायोगी भी हैं। कृष्ण को अलग-अलग लोगों ने अलग-अलग तरीकों से देखा और अनुभव किया है। दुर्योधन, कृष्ण के बारे में कहता है, ‘कृष्ण एक बहुत ही मूढ़ व्यक्ति है, जिसके चेहरे पर हमेशा एक शरारती मुस्कान रहती है। वह खा सकता है, पी सकता है, गा सकता है, प्रेम कर सकता है, झगड़ा कर सकता है और छोटे बच्चों के साथ खेल भी सकता है।


ऐसे में, कौन कहता है कि वह ईश्वर है?’ राधा उनको बिल्कुल अलग तरीके से देखती थीं। राधा कौन थीं? गांव की एक साधारण-सी लड़की, जो दूध का काम करती थीं। लेकिन राधा के नाम के बिना कृष्ण का नाम अधूरा माना जाता है, क्योंकि कृष्ण के प्रति उनमें अत्यंत श्रद्धा और प्रेम था। कृष्ण के चाचा अक्रूर कहते हैं, ‘इस युवा बालक को देखकर मुझे लगता है, मानो सूर्य, चंद्र, तारे, सब कुछ उसके चारों तरफ चक्कर काट रहे हों। जब वह बोलता है, तो ऐसा लगता है कि मानो कोई शाश्वत और अविनाशी आवाज सुनाई दे रही हो। अगर इस संसार में आशा नाम की कोई चीज है, तो वह स्वयं कृष्ण ही है। भगवान कृष्ण को महायोगी कहा जाता है। वे न सिर्फ योग में पारंगत थे बल्कि कहा जाता है कि बहुत सी सिद्धियां उन्हें स्वत: ही प्राप्त हो जाया करती थीं। कृष्ण ने जहां माता यशोदा को अपने मुंह से ब्रह्मांड के दर्शन करा दिए थे, वहीं अर्जुन को विराट स्वरूप के दर्शन कराकर उसे युद्ध के लिए तैयार करने वाले भी भगवान कृष्ण ही थे। श्री कृष्ण एक योगनिष्ठ आत्मा थे वे योग क्रिया में पारंगत थे, और उनकी जीवात्मा जन्म-जन्मांतर की योग क्रियाओं के कारण ऐसी शक्ति प्राप्त कर चुकी थी कि वह अपने पंच औतिक शरीर का निर्माण इच्छानुसार कर सकती थी।

भगवान की थी 16000 पत्नियां

कहते हैं कि भगवान कृष्ण की 16,108 पत्नियां थीं। यह सत्य नहीं है। वास्तव में भगवान कृष्ण की आठ पत्नियां रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा थीं। एक दिन देवराज इंद्र उनके पास आए और दैत्यराज भौमासुर के अत्याचार से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। श्रीकृष्ण सत्यभामा को साथ लेकर के गरुड़ पर सवार होकर प्रागज्योतिषपुर पहुंचे। भौमासुर को श्राप था कि उसकी मृत्यु एक स्त्री के हाथों होगी। कृष्ण ने वहां पहुंचकर मुर दैत्य और उसके छह पुत्रों का संहार किया। समाचार मिलते ही भौमासुर दैत्यों की सेना लेकर आया। कृष्ण ने सत्यभामा को सारथी बनाया और उनकी सहायता से भौमासुर का संघार कर दिया। साथ ही भौमासुर द्वारा हरण की गई 16,100 कन्याओं को मुक्त कराया।अपहृत कन्याओं को कोई भी अपनाने को तैयार नहीं था। ऐसे में भगवान कृष्ण ने उन्हें आश्रय दिया और उन सभी कन्याओं ने भगवान कृष्ण को अपने पति के रूप में स्वीकार किया। इसी कारण से भगवान कृष्ण की16,108 पत्नियां मानी जाती हैं।

लीलाधारी का गमन

द्वारिका के लोगों ने अचानक ही अशुभ संकेतों का अनुभव किया। कृष्ण का सुदर्शन चक्र, शंख, उनका रथ और बलराम का हल अदृश्य हो गया। उस समय तक साम्राज्य में चारों ओर अपराध अधर्म और अमानवीयता फैल चुकी थी। कृष्ण आगत घटना से आशंकित हो उठे उन्होंने प्रजाको प्रभास नदी के तट पर जाकर तीर्थयात्रा कर पापों से मुक्ति पाने के लिए कहा। पर यादव समुदाय वहां जाकर भी भोगविलास में लिप्त हो गया। दुःखी होकर कृष्ण एकांत वन में चले गए। यहां वे योगनिद्रा में लीन थे जब जरा नाम के भील ने उनके गुलाबी तलवे को हिरण की आंख समझ कर तीर चलादिया उसी से उनकी मृत्यु हुई। भगवान कृष्ण के प्रभास क्षेत्र में देह त्यागने के कारण यह हिंदुओं का सबसे पवित्र तीर्थ माना जाता है। उसी के बाद द्वारिका भी पानी में समा गई।

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