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शरद पूर्णिमा का रात चंद्रमा से होती है अमृत वर्षा

शरद पूर्णिमा का रात चंद्रमा से होती है अमृत वर्षा

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शरद पूर्णिमा सबसे अधिक महत्वपूर्ण इसलिए मानी जाती है ,क्योंकि इस दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होता है तथा पृथ्वी के सबसे अधिक नजदीक होता है। इसकी चांदनी हमें रोगमुक्त करती है। कहते हैं कि इस रात चांद को लगातार देखने से आंखों की रोशनी अच्छी हो जाती है। भले ही भारत के विभिन्न प्रांतों में इसे विभिन्न नामों से पुकारा जाता हो ,पर पूजा उपासना सब जगह होती है।

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बंगाल और उत्तर भारत में यह शरद पूर्णिमा कही जाती है, उड़ीसा में इसे क्वार पूर्णिमा कहते हैं विशेष रूप से यहां इस दिन गजलक्ष्मी की पूजा होती है। मिथिलांचल में इसे कोजागरी पूर्णिमा कहते हैं यहां इसे देवी महालक्ष्मी की पूजा के रूप में स्वीकारा गया है।

 


वैदिक धारणा के अनुसार इस रात चंद्रमा से अमृत वर्षा होती है। इसका लाभ मानव को मिले इसलिए चांद की रोशनी में खुले आकाश के नीचे खीर रखने की परंपरा चलाई गई जो आज भी कायम है। चंद्रमा की पूजा कर, मेवा-केसर युक्त खीर एक बर्तन में रख उसके मुंह पर झीना कपड़ा बांध कर खुले आकाश के नीचे रख दिया जाता है और सुबह यही खीर प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है।

शरद पूर्णिमा का यह पर्व कोजागरी पूजा के रूप में अधिक आकर्षक है। कोजागरी व्रत की पूजा दोपहर बारह बजे के बाद शुरू होती है । इस दिन लक्ष्मी की कलश, धूप, कौड़ी, सिंदूर, नारियल तथा दूर्वा से पूजा की जाती है। नैवेद्य में नारियल के लड्डू शुभ माने जाते हैं। इस दिन यदि कमलपुष्प से पूजा की जाए तो लक्ष्मी प्रसन्न हो कर धन-धान्य से घर भर देती है। उड़ीसा में वास्तव में यह महालक्ष्मी की पूजा है। इसमें देवी लक्ष्मी के साथ इंद्र के वाहन ऐरावत की भी पूजा होती है। महालक्ष्मी की षोडशोपचार पूजन कर व्रत रखा जाता है। रात को 108 दीपक जला कर फूल-धूप आदि से यह पूजन संपन्न किया जाता है तथा रात्रि जागरण करते हैं । यहां इस दिन मखाना डाल कर खीर बनाते हैं। शरद पूर्णिमा के दिन केसर गोरोचन तथा जड़ी बूटियों से जो श्रीयंत्र बनाया जाता है वह हर क्षेत्र में सफलता देने वाला है। इस रात्रि में दान का बड़ा महत्व है। कहते हैं देवी लक्ष्मी इस रात्रि को भ्रमण करती हैं और हर घर में जा कर पूछती हैं -को जागरी…? (कौन जागता है)। जो लोग जाग कर भजन कीर्तन करते होते हैं उनपर वह कृपा करती है।

शरद ऋतु अपने आप में बेहद खूबसूरत है इस समय आकाश स्वच्छ होता है नदी ,झीलें और तालाब जल से भरे होते हैंऔर तब उनमें खिले सफेद कुमदिनी के फूल ऐसे दिखाई देते हैं जैसे आसमान में चमकते तारों से होड़ ले रहे हों। कुल मिला कर यह आकाशी महोत्सव जैसा दिखता है। महाभारत काल में भी कौमुदी महोत्सव का जिक्र मिलता है। इस महोत्सव का विवरण बौद्ध जातक कथाओं में स्पष्ट रूप से आया है। दीर्घ निकाय में लिखा है कौमुदी महोत्सव की रात्रि मगध सम्राट अजातशत्रु अपने महल की छत पर मंत्रियों के साथ बैठा था और उत्सव की रंगीनियां देख कर आनंदित हो रहा था। उसने कहा-
मित्रो, चंद्रमा की चांदनी से परिपूर्ण रात्रि मन को प्रसन्न करने वाली है।
यह चांदनी रात कितनी सुंदर है।
कितनी प्यारी है यह पूर्ण चंद्र से चमकती चांदनी रात्रि
बेचैन मन को शांत करने वाली
और एक विशिष्ट संकेत देने वाली।
इससे साफ पता लगता है कि कौमुदी महोत्सव उस समय प्रेमोत्सव के रूप में अत्यंत लोकप्रिय था।

इस दिन संपूर्ण नगर दीपों से जगमगाता था। सभी नागरिक नए और सुंदर व पहन कर इसमें शामिल होते थे। राजा सुंदर रथ पर सवार हो कर नगर की रंगीनियां देखने निकलता था। इस उत्सव में युवा जोड़े फूलों से शृंगार कर गलबहियां डाले घूमते थे। लगता था कि यह देवताओं की नगरी है या फिर यक्षों-अप्सराओं से सजा हुआ इंद्रलोक। चारों तरफ गीत -संगीत और सौंदर्य ही सौंदर्य। देखें तो इस प्रेमोत्सव का आज की आधुनिकतम संस्कृति मुकाबला नहीं कर सकती। रोचक यह,कि सिर्फ मगध में ही नहीं बल्कि इस महोत्सव के वाराणसी और श्रावस्ती में भी मनाए जाने प्रमाण मिले हैं।

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