फाल्गुन संकष्टी : आज करेंगे भगवान गणेश की पूजा तो दूर होंगे सभी कष्ट

फाल्गुन संकष्टी : आज करेंगे भगवान गणेश की पूजा तो दूर होंगे सभी कष्ट

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फाल्गुन संकष्टी (Falgun sankashti) श्री गणेश चतुर्थी फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी को कहा जाता है। 22 फरवरी यानी आज संकष्टी चतुर्थी है। इसे फाल्गुन चतुर्थी या संकष्टी चौथ भी कहते हैं। ज्योतिर्विद पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस दिन भगवान श्री गणेश (Lord ganesha) की आराधना सुख-सौभाग्य प्रदान करने वाली होती है और कष्टों को दूर करने वाली होती है। इस चतुर्थी पर व्रत करके भगवान गणेश का पूजन करने से सारी विपदाएं दूर होती हैं। वस्तुतः संकट चतुर्थी संतान की दीर्घायु हेतु भगवान गणेश और माता पार्वती की पूजा है। इस दिन पूजा करने से संतान के ऊपर आने वाले सभी कष्ट शीघ्रातिशीघ्र दूर हो जाते हैं। धर्मराज युधिष्ठिर ने भी भगवान श्री कृष्ण की सलाह पर इस व्रत को किया था। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन से गणेश दर्शन का पुण्य प्राप्त होता है।


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षोडशोपचार पूजा विधि : 
इस व्रत की शुरुआत सूर्योदय से पूर्व या सूर्योदय काल से ही करनी चाहिए। सूर्यास्त से पहले ही गणेश संकट चतुर्थी व्रत कथा-पूजा होती है। पूजा में तिल का प्रयोग अनिवार्य है। तिल के साथ गुड़, गन्ने और मूली का उपयोग करना चाहिए। इस दिन मूली भूलकर भी नहीं खानी चाहिए कहा जाता है कि मूली खाने धन-धान्य की हानि होती है। इस व्रत में चंद्रोदय के समय चन्द्रमा को तिल, गुड़ आदि का अर्घ्य देना चाहिए, साथ ही संकटहारी गणेश एवं चतुर्थी माता को तिल, गुड़ आदि से अर्घ्य देना चाहिए। अर्घ्य देने के उपरांत ही व्रत समाप्त करना चाहिए।
इस दिन निर्जला व्रत का भी विधान है। माताएं निर्जला व्रत अपने पुत्र के दीर्घायु के लिए अवश्य ही करती है। इस दिन तिल का प्रसाद खाना चाहिए। गणेश जी को दूर्वा तथा लड्डू अत्यंत प्रिय है अत: गणेश जी पूजा में दूर्वा और लड्डू जरूर चढ़ाना चाहिए।
पूजन सामग्री (वृहद् पूजन के लिए ) – शुद्ध जल, दूध, दही, शहद, घी, चीनी, पंचामृत, वस्त्र, जनेऊ, मधुपर्क, सुगंध, लाल चन्दन, रोली, सिन्दूर, अक्षत (चावल), फूल, माला, बेलपत्र, दूब, शमीपत्र, गुलाल, आभूषण, सुगन्धित तेल, धूपबत्ती, दीपक, प्रसाद, फल, गंगाजल, पान, सुपारी, रूई, कपूर।
विधि- गणेश जी की मूर्ती सामने रखकर और श्रद्धा पूर्वक उस पर पुष्प छोड़े यदि मूर्ती न हो तो सुपारी पर मौली लपेटकर चावल पर स्थापित करें -और आवाहन करें –
गजाननं भूतगणादिसेवितम कपित्थजम्बू फल चारू भक्षणं |
उमासुतम शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम ||
आगच्छ भगवन्देव स्थाने चात्र स्थिरो भव |
यावत्पूजा करिष्यामि तावत्वं सन्निधौ भव ||
पौराणिक कथा :
  • भगवान शिव और माता पार्वती एक बार नदी किनारे बैठे हुए थे। उसी दौरान माता पार्वती को चौसर खेलने का मन हुआ, लेकिन उस समय वहां माता और भगवान शिव के अलावा कोई और मौजूद नहीं था। खेल में हार-जीत का फैसला करने के लिए एक व्यक्ति की जरूरत थी। इस विचार के बाद दोनों ने एक मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसमें जान डाल दी और उससे कहा कि खेल में कौन जीता इसका फैसला तुम करना। खेल के शुरी होते ही माता पार्वती विजय हुई और इस प्रकार तीन से चार बार उन्हीं की जीत हुई, लेकिन एक बार गलती से बालक ने भगवान शिव का विजयी के रूप में नाम ले लिया। इसके कारण माता पार्वती क्रोधित हो गई और उस बालक को लंगड़ा बना दिया। बालक उनसे क्षमा मांगता है और कहता है कि उससे भूल हो गई उसे माफ कर दें। माता कहती हैं कि श्राप वापस नहीं हो सकता, लेकिन एक उपाय करके इससे मुक्ति पा सकते हो। माता पार्वती कहती हैं कि इस स्थान पर संकष्टी के दिन कुछ कन्याएं पूजा करने आती हैं, तुम उनसे व्रत की विधि पूछना और उस व्रत को श्रद्धापूर्वक करना।
  • संकष्टी के दिन कन्याएं वहां आईं और बालक उनसे व्रत की विधि पूछता है और उसके बाद विधिवत व्रत करने से भगवान गणेश को प्रसन्न कर लेता है। भगवान गणेश उसे दर्शन देकर उसकी इच्छा पूछते हैं तो वो कहता है कि वो भगवान शिव और माता पार्वती के पास जाना चाहता है। भगवान गणेश उसकी इच्छा पूरी करते हैं और वो बालक भगवान शिव के पास पहुंच जाता है। लेकिन वहां सिर्फ भगवान शिव होते हैं क्योंकि माता पार्वती भगवान शिव से रूठ कर कैलाश छोड़कर चली जाती हैं। भगवान शिव उससे पूछते हैं कि वो यहां कैसे आया तो बालक बताता है कि भगवान गणेश के पूजन से उसे ये वरदान प्राप्त हुआ है। इसके बाद भगवान शिव भी माता पार्वती को मनाने के लिए ये व्रत रखते हैं। इसके बाद माता पार्वती का मन अचानक बदल जाता है और वह वापस कैलाश लौट आती हैं। इस कथा के अनुसार भगवान गणेश का संकष्टी के दिन व्रत करने से हर मनोकामना पूर्ण होती है और संकट दूर होते हैं।

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