नाग पंचमी पर इस विधि से करेंगे भगवान शिव की पूजा तो दूर होगा पितृ दोष

नाग पंचमी पर इस विधि से करेंगे भगवान शिव की पूजा तो दूर होगा पितृ दोष

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प्रत्येक वर्ष शुक्ल श्रावण पंचमी को नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता का पूजन होता है। नाग पंचमी (Nag Panchami) पर भगवान शिव की आराधना करने से कालसर्प योग, पितृ दोष, चांडाल योग, मंगल दोष का निवारण होता है। इस दिन सूर्य और बृहस्पति सिंह और चंद्रमा कन्या राशि में होंगे। यह संयोग सुख शांति और समृद्धि प्रदान करने वाला है। नाग पंचमी के दिन भगवान शिव (Lord Shiva) के विधिवत पूजन से हर प्रकार का लाभ प्राप्त होता है।


इस दिन काष्ठ पर एक कपड़ा बिछाकर उस पर रस्सी की गांठ लगाकर सर्प (Snake) का प्रतीक रूप बनाकर, उसे काले रंग से रंग दिया जाता है। कच्चा दूध, घृत और शर्करा तथा धान का लावा इत्यादि अर्पित किया जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस दिन दीवारों पर गोबर से सर्पाकार आकृति का निर्माण कर सविधि पूजन किया जाता है। प्रत्येक तिथि के स्वामी देवता हैं। पंचमी तिथि के स्वामी देवता सर्प हैं। इसलिए यह कालसर्पयोग की शांति का उत्तम दिन है।

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प्रचलित मान्यताओं के अनुसार पितृ दोष से मुक्ति के लिए इस दिन भगवान शिव की पूजा (worship) का विधान किया गया है। नाग पंचमी पर नाग की पूजा प्रत्यक्ष मूर्ति या चित्रों के रूप में की जाती है। इसी दिन सर्पो के प्रतीक रूप को दूध से स्नान करा कर उनकी पूजा करने का विधान है। दूध पिलाने से, वासुकी कुंड में स्नान करने, निज गृह के द्वार में दोनों और गोबर के सर्प बनाकर उनका दही, दु़र्वा, कुशा, गंध, अक्षत, पुष्प, मोदक और मालपुओं आदि से पूजा करने से घर में सर्पों का भय नहीं होता।

नाग पंचमी को चंद्रमा की राशि कन्या होती है और राहु का स्वगृह कन्या राशि है। राहु के लिए प्रशस्त तिथि, नक्षत्र एवं स्वगृही राशि के कारण नागपंचमी सर्पजन्य दोषों की शांति के लिए उत्तम दिन माना जाता है। पंचमी तिथि को भगवान आशुतोष भी सुस्थानगत होते हैं। इसलिए इस दिन सर्प शांति के अंतर्गत राहु-केतु का जप, दान, हवन उपयुक्त होता है। अन्य दुर्योगों के लिए शिव का अभिषेक, महामृत्युंजय मंत्र का जप, यज्ञ, शिव सहस्रनाम का पाठ, गाय और बकरे के दान का भी विधान है।

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नागों के देवता महादेव की भी करें पूजा :

नाग पंचमी के दिन नाग की पूजा के साथ-साथ नागों के देवता देवाधिदेव महादेव की भी पूजा करना चाहिए।
पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि काल सर्प दोष निवारण के लिए नाग पंचमी के दिन नागनुमा अंगूठी बनवाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कर उसे धारण करें। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में तांबे का सर्प बनवाकर उसकी पूजा करके शिवलिंग पर चढ़ाएं तथा इससे पूर्व एक रात उसे घर में ही रखें।
नाग पंचमी को एक नाग-नागिन सपेरों से बंधन मुक्त कराने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है ।
इस अवसर पर पितृ तर्पण कर नागाबली और नारायण नागाबली का प्रयोग पितरों की मुक्ति ओर शांति हेतु उज्जैन के सिद्धवट या गया कोठा तीर्थ पर अवश्य करना चाहिए।
ज्योतिषाचार्य पं दयानन्द शास्त्री ने बताया कि इस दिन पितृ दोष से परेशान जातक को “ऊं नम: शिवाय मंत्र” का जाप करना चाहिए। राहु कवच या राहु स्त्रोत का पाठ करें। राहु की तेल से भगवान शिव का रुद्राभिषेक करवाने से भी तत्काल ओर प्रभावी परिणाम मिलते हैं।
सातमुखी रुद्राक्ष गले में पहने तथा काल सर्प योग के साथ-साथ चंद्र राहु, चंद्र केतु, सूर्य-केतु, एक भी ग्रहण योग हो तो केतु का रत्न लहसुनिया मध्यमा अंगुली में पहनें। इसके अलावा आप घर व कार्यालय में मोर पंख रखें व कालसर्प निदान के लिए शांति विधान करें। चंदन की लकड़ी पर चांदी का जोड़ा बनवाकर पूजा करके धारण करें।


ऐसे करें अपनी राशि के अनुसार करें पूजन :

नागपंचमी पर अपनी राशि के अनुसार नागों की मूर्तियों की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।
मेष को अनन्त नाग, वृष को कुलिक नाग, मिथुन को वासुकि नाग, कर्क को शंखपाल नाग, सिंह को पद्य नाग, कन्या को महापद्य नाग की पूजा करनी चाहिए।
वहीं तुला को तक्षक नाग, वृश्चिक को ककरेटक नाग, धनु को शंखचूर्ण नाग, मकर को घातक नाग, कुम्भ को विषधर नाग और मीन को शेषनाग की प्रतिमा की पूजा नाग पंचमी को करनी चाहिए। इससे विशेष फल की प्राप्ति होती है।

शुभ भी होता है कालसर्प योग :

गरुड़ पुराण के अनुसार नाग-नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करने से सुख-शांति की प्राप्ति होती है। राहु को सर्प का मुख और केतु को उसकी पूंछ माना जाता है।
जब भी समस्त ग्रह इन दोनों ग्रहों के मध्य में आते हैं तो वह कालसर्प योग कहलाता है। कालसर्प योग शुभ व अशुभ दोनों प्रकार के होते हैं। इसकी शुभता और अशुभता अन्य ग्रहों के योगों पर निर्भर करती है।
जब भी कालसर्प योग में पंच महापुरुष योग, रुचक, भद्र, मालव्य व शश योग, गज केसरी, राज सम्मान योग महाधनपति योग बनें तो व्यक्ति उन्नति करता है।
जब कालसर्प योग के साथ अशुभ योग बने जैसे-ग्रहण, चाण्डाल, अशांरक, जड़त्व, नंदा, अंभोत्कम, कपर, क्रोध, पिशाच हो तो वह अनिष्टकारी होता है।
ज्योतिर्विद पं दयानन्द शास्त्री के अनुसार ज्योतिषशास्त्र में 576 प्रकार के कालसर्प योग बताए गए हैं जिनमें लग्न से द्वादश स्थान तक मुख्यत: 12 प्रकार के सर्प योगों में अन्नत, कुलिक, वासुकी, शंखपाल, पदम, महापदम, तक्षक, कर्कोटक, शंखनाद, पातक, विशान्त तथा शेषनाग शामिल है।
कालसर्प योग दोष निवारण के लिए नागपंचमी के दिन सर्प की पूजा करना सर्वाधिक अच्छा रहता है।


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