सावन में भोलेनाथ को बेलपत्र से करें प्रसन्न, जानिए इसका महत्व

सावन में भोलेनाथ को बेलपत्र से करें प्रसन्न, जानिए इसका महत्व

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सावन का पावन महीना चल रहा है और इस समय बेलपत्रों से विशेष रूप से शिव की पूजा की जाती है। भगवान शिव (Lord shiva) की पूजा में बेलपत्र का बहुत महत्व होता है और इनके बिना शिव की उपासना संपूर्ण नहीं होती। अगर आप भी देवों के देव महादेव की विशेष कृपा पाना चाहते हैं तो बेलपत्र के महत्व को समझना बेहद ज़रूरी है। बेल के पेड़ की पत्तियों को बेलपत्र कहते हैं। बेलपत्र में तीन पत्तियां एक साथ जुड़ी होती हैं, लेकिन इन्हें एक ही पत्ती मानते हैं। भगवान शिव को बेलपत्र (Bel patra) बेहद प्रिय हैं। भांग धतूरा और बिल्व पत्र से प्रसन्न होने वाले केवल शिव ही हैं। बेलपत्र यूं तो आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं, किंतु कुछ ऐसे बेल पत्र भी होते हैं जो दुर्लभ पर चमत्कारिक और अद्भुत होते हैं।



शिव पूजा में ऐसे होने चाहिए बेलपत्र –

एक बेलपत्र में तीन पत्तियां होनी चाहिए। 

पत्तियां कटी या टूटी हुई न हों और उनमें कोई छेद भी नहीं होना चाहिए।
भगवान शिव
को बेलपत्र चिकनी ओर से ही अर्पित करें।
एक ही बेलपत्र को जल से धोकर बार-बार भी चढ़ा सकते हैं।
शिव जी को बेलपत्र अर्पित करते समय साथ ही में जल की धारा जरूर चढ़ाएं।
बिना जल के बेलपत्र अर्पित नहीं करना चाहिए।

हमारे धार्मिक ग्रंथों में बिल्व पत्र के वृक्ष को श्री वृक्ष भी कहा जाता है इसे शिवद्रुम भी कहते हैं। बिल्वाष्टक और शिव पुराण (Shiva Purana) के अनुसार भगवान शिव को बेलपत्र अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि बेल पत्र के तीनों पत्ते त्रिनेत्रस्वरूप् भगवान शिव के तीनों नेत्रों को विशेष प्रिय हैं। बिल्व पत्र के पूजन से सभी पापों का नाश होता है। स्कंदपुराण में बेल पत्र के वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में कहा गया है कि एक बार मां पार्वती ने अपनी उंगलियों से अपने ललाट पर आया पसीना पोंछकर उसे फेंक दिया, मां के पसीने की कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, कहते हैं उसी से बेल वृक्ष उत्पन्न हुआ।

शास्त्रों के अनुसार इस वृक्ष की जड़ों में मां गिरिजा, तने में मां महेश्वरी, इसकी शाखाओं में मां दक्षयायनी, बेल पत्र की पत्तियों में मां पार्वती, इसके फूलों में मां गौरी और बेल पत्र के फलों में मां कात्यायनी का वास हैं। हमारे शास्त्रों में बिल्व का पेड़ संपन्नता का प्रतीक, बहुत पवित्र तथा समृद्धि देने वाला है। बिल वृक्ष में मां लक्ष्मी का भी वास है अत: घर में बेल पत्र लगाने से देवी महालक्ष्मी बहुत प्रसन्न होती हैं, जातक वैभवशाली बनता है।

बेलपत्र से भगवान शिव का पूजन करने से समस्त सांसारिक सुख की प्राप्ति होती है, धन-सम्पति की कभी भी कमी नहीं होती है।

बेलपत्र के पेड़ की टहनी से चुन-चुनकर सिर्फ बेलपत्र ही तोड़ना चाहिए, कभी भी पूरी टहनी नहीं तोड़ना चाहिए।

शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करने से महादेव शीघ्र प्रसन्न होते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव की आराधना बेलपत्र के बिना पूरी नहीं होती। लेकिन एक बेलपत्र में तीन पत्तियां अवश्य ही होनी चाहिए तभी वह बिलपत्र शिवलिंग पर चढ़ने योग्य होता है ।

भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करते समय जल की धारा भी जरूर चढ़ाएं।

यह ध्यान दीजिये कि बेलपत्र की पत्तियां कटी फटी या टूटी ना हों और उनमें कोई छेद भी नहीं होना चाहिए।

बेलपत्र को भगवान शिव पर चिकनी तरफ से ही अर्पित करें।

अगर बेलपत्र पर ॐ नम: शिवाय या राम राम लिखकर उसे भगवान भोलेनाथ पर अर्पित किया जाय तो यह बहुत ही पुण्यदायक होता है ।


शास्त्रों के अनुसार रविवार के दिन बेलपत्र का पूजन करने से समस्त पापो का नाश होता है।

तृतीया तिथि के स्वामी देवताओं के कोषाध्यक्ष एवं भगवान भोलाथ के प्रिय कुबेर जी है । तृतीया को बेलपत्र चढ़ाकर कुबेर जी की पूजा करने , उनके मन्त्र का जाप करने से अतुल ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। और अगर कुबेर जी की पूजा बेल के वृक्ष के नीचे बैठकर, अथवा शिव मंदिर में की जाय तो पीढ़ियों तक धन की कोई भी कमी नहीं रहती है ।

शि‍व को बेलपत्र अर्पित करते वक्त और इसे तोड़ते समय कुछ खास नियमों का पालन करना जरूरी होता है ।

बेलपत्र को संस्कृत में ‘बिल्वपत्र’ कहा जाता है। जो कि भगवान शिव को बहुत ही प्रिय है। ऐसी मान्यता है कि बेलपत्र और जल से भगवान शंकर का मस्तिष्क शीतल रहता है। पूजा में इनका प्रयोग करने से वे बहुत जल्द प्रसन्न होते हैं।

जानिए बेलपत्र तोड़ने के नियम –

भूलकर भी चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथियों के साथ-साथ सं‍क्रांति के समय और सोमवार को बेलपत्र नहीं तोड़नी चाहिए।

शास्त्रों में कहा गया है कि अगर नया बेलपत्र न मिल सके, तो किसी दूसरे के चढ़ाए हुए बेलपत्र को भी धोकर कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे किसी भी तरह का पाप नहीं लगेगा। जो स्कंदपुराण में बताया गया है।

अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन:।
शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि क्वचित्।। (स्कंदपुराण)

कभी भी बेलपत्र को टहनी सहित नहीं तोड़ना चाहिए। बल्कि बेलपत्र चुन-चुनकर तोड़ना चाहिए जिससे कि वृक्ष को नुकसान न पहुंचे। इसके साथ ही बेलपत्र तोड़ने से पहले और बाद में वृक्ष को मन ही मन प्रणाम कर लेना चाहिए।

बिल्व-वृक्ष के मूल अर्थात उसकी जड़ में शिव लिंग स्वरूपी भगवान शिव का वास होता है। इसी कारण से बिल्व के मूल में भगवान शिव का पूजन किया जाता हैं। पूजन में इसकी मूल यानी जड़ को सींचा जाता हैं।

कैसे चढ़ाएं शिवलिंग पर बेलपत्र –

शिवलिंग पर हमेशा उल्टा बेलपत्र अर्पित करना चाहिए, यानी पत्ते का चिकना भाग शिवलिंग के ऊपर रहना चाहिए।
बेलपत्र में चक्र और वज्र नहीं होना चाहिए। कोशिश करें तो बेलपत्र कटा-फटा न हो।
बेलपत्र 3 से लेकर 11 दलों तक के होते हैं। ये जितने अधिक पत्र के हों, उतने ही उत्तम माने जाते हैं।
शिवलिंग पर दूसरे के चढ़ाए बेलपत्र की उपेक्षा या अनादर नहीं करना चाहिए।

पंडित दयानंद शास्त्री, उज्जैन (म.प्र.) (ज्योतिष-वास्तु सलाहगाड़ी) 09669290067, 09039390067

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