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भारत की इस गुफा में रहती थी देवदासी, इस वजह से छोड़ना पड़ा था देवलोक

जोगीमारा के भित्तिचित्र भारत के प्राचीनतम भित्तिचित्रों में से एक

भारत की इस गुफा में रहती थी देवदासी, इस वजह से छोड़ना पड़ा था देवलोक

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आपने बहुत से धार्मिक सीरियल (Religious Serials) या नाटक देखे होंगे। धार्मिक सीरियल में जहां देवी-देवताओं के जनकल्याण से जुड़ी पुरानी कथाओं का चरित्रण किया जाता है, तो वहीं देवी-देवताओं की सेवा में जुटी देवदासियों का रोल भी कम नहीं होता है। क्या आपको पता है कि ये देवदासियां (Devadasiyan) भारत की एक गुफा में भी रहा करती थीं। इस गुफा का संचालन किसी सुतनुका देवदासी (Sutanuka Devadasi) के हाथ में था। यह देवदासी रंगशाला की रूपदक्ष थी। देवदीन की चेष्टाओं में उलझी नारी सुलभ हृदया सुतनुका को नाट्यशाला के अधिकारियों का कोपभाजन बनना पड़ा और वियोग में अपना जीवन बिताना पड़ा। रूपदक्ष देवदीन (Roopdaksha Devdin) ने इस प्रेम प्रसंग को सीताबेंगरा की भित्ति पर अभिलेख के रूप में सदैव के लिए अंकित करा दिया।

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यहां है यह गुफा

आपको बताते चलें कि जोगीमारा गुफा छत्तीसगढ़ ( Jogimara Cave Chhattisgarh) के प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है। ये गुफा सरगुजा जिला मुख्यालय अम्बिकापुर से 50 किलोमीटर की दूरी पर रामगढ़ नामक स्थान में स्थित है। यहीं पर सीताबेंगरा, लक्ष्मण झूला (Laxman Jhula) के चिह्न भी हैं। इन गुफाओं की भित्तियों पर कई तरह के चित्र अंकित हैं।

 

प्राचीन नाट्यशाला है

जोगीमारा गुफा के समीप ही सीताबेंगरा गुफा (Sitabengra Cave) है। इस गुफा का महत्त्व इसके नाट्यशाला होने से है। कहा जाता है कि यह एशिया की अतिप्राचीन नाट्यशाला (Ancient Theater) है। भास के नाटकों के समय निर्धारण में यह पुराता देवदीन पर प्रेमासक्तत्त्विक खोज महत्त्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि नाटक प्रविधि को भास ने लिखा था और उसके नाटकों में चित्रशालाओं (Panorama) के भी सन्दर्भ दिए गए हैं।

क्या है इतिहास

यहां से प्राप्त एक अभिलेख के आधार पर निश्चित किया गया है कि सम्राट अशोक (Emperor Ashoka) के समय में जोगीमारा गुफा का निर्माण हुआ था। ऐसा माना जाता है कि जोगीमारा के भित्तिचित्र भारत (India) के प्राचीनतम भित्तिचित्रों में से हैं। मान्यता है कि देवदासी सुतनुका ने इन भित्तिचित्रों का निर्माण करवाया था। चित्रों में भवनों, पशुओं और मनुष्यों की आकृतियों का आलेखन किया गया है। एक चित्र में नृत्यांगना बैठी हुई स्थिति में चित्रित है और गायकों तथा नर्तकों का झुंड के घेरे में है। यहां के चित्रों में झांकती रेखाएं लय और गति से भरी हैं।

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