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संतोषगढ़ के विश्वकर्मा मंदिर में नतमस्तक हुए श्रद्धालु, Covid नियमों का रखा गया ध्यान

विश्वकर्मा भगवान की पूजा अर्चना कर व्यापार में लाभ की कामना की

संतोषगढ़ के विश्वकर्मा मंदिर में नतमस्तक हुए श्रद्धालु, Covid नियमों का रखा गया ध्यान

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ऊना। आज देश भर में सृष्टि के रचयिता भगवान विश्वकर्मा ( Lord Vishwakarma) को नमन किया जा रहा है। जिला ऊना के संतोषगढ़ स्थित सुप्रसिद्ध धार्मिक स्थल विश्वकर्मा मंदिर में भी आज श्रद्धालुओं का खूब जनसैलाब उमड़ा। 1948 में निर्मित इस मंदिर की स्थापना हकीम प्रताप सिंह नाम के श्रद्धालु द्वारा की गई थी। तब से लेकर आज तक यह मंदिर हिमाचल, पंजाब तथा हरियाणा से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। आज विश्वकर्मा दिवस के अवसर पर मंदिर को दुल्हन की तरह सजाया गया था, वहीं कोविड-19 के चलते इस बार मंदिर कमेटी द्वारा मंदिर परिसर में धार्मिक विषयों पर आधारित प्रदर्शनियां और भंडारे का आयोजन नहीं किया गया था। विश्वकर्मा दिवस के उपलक्ष्य में हजारो की तादाद में श्रद्धालु सुबह से ही मंदिर में पहुंचना शुरू हो गए थे तथा दूर दराज क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं ने भगवान् विश्वकर्मा के दर्शन कर आशीर्वाद वाद प्राप्त किया। मंदिर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को थर्मल स्क्रीनिंग, सैनेटाइजर, मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का भी पालन करवाया गया।

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मंदिर कमेटी के सदस्य ने बताया कि इस मंदिर में हर वर्ष हजारों श्रद्धालु भगवान् विश्वकर्मा के दर्शनों के लिए आते है। विश्वकर्मा दिवस के दिन सभी कारीगर भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने के उपरान्त अपनी मशीनों की पूजा करते है तथा उसके बाद ही वह अपना काम शुरू करते है। अगर हम अपने प्राचीन ग्रंथों उपनिषद एवं पुराण आदि का अवलोकन करें तो पाएंगे कि आदि काल से ही विश्वकर्मा शिल्पी अपने विशिष्ट ज्ञान एवं विज्ञान के कारण ही न मात्र मानवों अपितु देवगणों द्वारा भी पूजित और वंदित है। भगवान विश्वकर्मा के आविष्कार एवं निर्माण कार्यों के सन्दर्भ में इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पाण्डवपुरी, सुदामापुरी, शिवमण्डलपुरी आदि का निर्माण इनके द्वारा किया गया है। पुष्पक विमान का निर्माण तथा सभी देवों के भवन और उनके दैनिक उपयोगी होने वाले वस्तुएं भी इनके द्वारा ही बनाया गया है । कर्ण का कुण्डल, विष्णु भगवान का सुदर्शन चक्र, शंकर भगवान का त्रिशुल और यमराज का कालदण्ड इत्यादि वस्तुओं का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया है।

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