Expand

देवोत्थानी एकादशीः योग निद्रा से जागे भगवान विष्णु

देवोत्थानी एकादशीः योग निद्रा से जागे भगवान विष्णु

देवोत्थानी एकादशी को तुलसी विवाह उत्सव भी कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कार्तिक शुक्ल पक्ष की देव प्रबोधिनी एकादशी वह तिथि है, जब क्षीर सागर में सोए हुए भगवान विष्णु जागते हैं। स्थानीय भाषा में इसे देव उठानी एकादशी भी कहा जाता है। कहते हैं कि इसी दिन भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागते हैं। यह चातुर्मास की समाप्ति का संकेत है।

श्री हरि के जागने के बाद से ही सारे मांगलिक कार्य शुरू किए जाते हैं। देवउठनी एकादशी के बाद सभी तरह के शुभ कार्य शुरू हो जाते हैं, लेकिन इस बार देव जागने के 18 दिन बाद भी कोई वैवाहिक और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त नहीं है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार पहले भगवान के सोने-जागने का कोई नियम नहीं था। वे जब चाहते, लंबे समय के लिए योगनिद्रा में चले जाते और जब जागते, तो फिर महीनों जागते ही रहते थे।

देवी लक्ष्मी इस अव्यवस्था से बेहद अप्रसन्न थीं। उन्होंने श्री हरि से ही इसकी शिकायत की और कहा, कि आप जब सोते हैं तो आपके दर्शनों की इच्छा रखने वाले कितने ही ऋषि-मुनियों को निराश हो कर वापस चला जाना पड़ता है और इसका लाभ उठा कर दैत्य धरती पर अधर्म फैलाते हैं तथा सभी मानवों को पीड़ा देते हैं। भगवान विष्णु ने बड़े धैर्य से देवी लक्ष्मी की बात सुनी और कहा कि इस समस्या का समाधान वे शीघ्र ही कर देंगे।

उसी के बाद से भगवान विष्णु ने अपनी योग निद्रा में जाने का समय निश्चित कर लिया कि वे मात्र चार महीने ही योग निद्रा में रहेंगे। चार महीने बाद जब उनका जागरण का दिन आता है तो अनेक प्रकार से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है तथा व्रत किया जाता है। व्रत करने वाली महिलाएं इस दिन सुबह स्नान कर आंगन में अल्पना बनाती हैं तथा चौक पूर कर उसमें भगवान विष्णु के चरणों को कलात्मक रूप से अंकित करती हैं।

दिन की तेज धूप से बचाने के लिए श्री विष्णु के चरणों को फूलों से ढंक दिया जाता है। रात्रि को विधिवत पूजन करते हैं और अगली सुबह शंख, घंटा-घडि़याल बजा कर भगवान को जगाया जाता है व कथा सुनी जाती है। पापों से मुक्ति के लिए तथा मोक्ष प्राप्त करने के लिए यह एकादशी अत्यंत श्रेष्ठ मानी गई है।

कुछ जगहों पर तुलसी विवाह का आयोजन इसी दिन से शुरू हो जाता है और कुछ क्षेत्रों में इसके अगले दिन से शुरू होता है। तुलसी को विष्णु प्रिया भी कहते हैं। तुलसी एक साधारण सा पौधा है परंतु भारतीयों के लिए यह गंगा-यमुना के समान पवित्र है। पूजा की सामग्री में तुलसी दल आवश्यक समझा जाता है। तुलसी को जल चढ़ाना और संध्या समय उसके आगे घी का दीपक जलाना शुभ माना गया है।

Facebook Join us on Facebook Twitter Join us on Twitter Google+ Join us on Google+ Instagram Join us on Instagram Youtube Join us on Youtube

RELATED NEWS

हिमाचल अभी अभी बुलेटिन

Advertisement
Download Himachal Abhi Abhi App Himachal Abhi Abhi IOS App Himachal Abhi Abhi Android App

राशिफल

Himachal Abhi Abhi E-Paper



सब्सक्राइब करें Himachal Abhi Abhi अलर्ट
Logo - Himachal Abhi Abhi

पाएं दिनभर की बड़ी ख़बरें अपने डेस्कटॉप पर

अभी नहीं ठीक है