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Dharamshala की Politics में बागियों का वार अभी बाकी है

Dharamshala की Politics में बागियों का वार अभी बाकी है

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धर्मशाला। प्रदेश में इस वर्ष चुनाव होने हैं और ऐसे वक्त में किसी भी पार्टी में टिकट के चाहवानों की फेहरिस्त अपने आप ही लंबी हो जाती है।अपने पोस्टर दीवारों पर देखने और अपने नाम के नारे सुनने को आतुर हुए नेताओं की सोई पड़ी उम्मीदें परवान होती नजर आती हैं। कमोबेश हर विधानसभा क्षेत्र में कुछ ऐसा ही मंजर सामने आता है।


  • कांग्रेस, बीजेपी दोनों को परेशान कर सकते हैं रूठे हुए नेता
  • कुछ सामने आ गए हैं तो कुछ पर्दे के पीछे से चल रहे हैं चालें

कुछ विधानसभा क्षेत्रों में यह अभी से ही साफ दिख रहा है तो कुछ में अपने सपनों को परवान चढ़ाने के लिए नेता सही वक्त का इंतजार कर रहे हैं। चुनावों के आते आते कुछ तो अपनी उम्मीदों को अपने आकाओं के आश्वासनों पर बक्से में बंद कर लेते हैं, लेकिन कुछ चुनावों को आखिरी मौका समझते हुए सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। ऐसे प्रबल इच्छाधारी और चुनावी नेताओं को राजनीतिक पार्टियां बागी का नाम देती हैं और इन बागियों ने कई बार अपनी ही पार्टी के जीत के समीकरण बिगाड़ने में अहम रोल भी निभाया है।

धर्मशाला विधानसभा क्षेत्र में भी कुछ ऐसा ही है और बागी यहां पर अपना वार करने की तैयारी में हैं। बीजेपी हो या कांग्रेस यहां दोनों ही पार्टियों को इन बागियों का सामना आने वाले समय में करना पड़ सकता है। कांग्रेस की बात करें तो धर्मशाला में बगावत के सुर फूटने शुरू हो चुके हैं। बीजेपी तो कांग्रेस विधायक पर स्थानीय लोगों को दरकिनार कर बाहरी लोगों को तरजीह देने के आरोप लगाती रही है, लेकिन अब कांग्रेस से जुड़े रहे कुछ नेता भी यही बात खुलेआम कहते फिर रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनावों में भी लोकल बनाम बाहरी का मुद्दा खूब उछला था और तब बीजेपी ही यह बात कहती थी। अब लग रहा है कि आगामी चुनावों में कुछ कांग्रेसी ही यह राग अलापते नजर आएं। एक नेता पिछले चुनावों में टिकट मिलने के बाद भी टिकट से महरूम कर दिया गया था अब इन चुनावों में वह भी अपनी दावेदारी एक बार फिर से पेश कर सकते हैं। वहीं कांग्रेस में ही कुछ चेहरे ऐसे हैं जो कि बगावत का यह खेल पर्दे के पीछे ही जारी रखना चाहेंगे और सामने तभी आएंगे जब मैदान उनके लिए साफ़ होगा। धर्मशाला विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी की बात करें तो यहां भी बागियों की लिस्ट लंबी है। एक समय तो ऐसा भी आ गया था कि इन बागियों ने मिलकर एक समानांतर बीजेपी मंडल का गठन भी कर लिया था। 

खैर, उस समय तो वरिष्ठ नेता शांता कुमार ने सबको एक साथ एक मंच पर ला दिया, लेकिन यह एकता ज्यादा दिन तक नहीं रह सकी। आज भी यह नेता अपनी अलग डगर पर चल रहे हैं। पिछले चुनावों में कांग्रेस की जीत में बीजेपी के इन बागियों ने काफी अहम रोल निभाया था और इन आगामी चुनावों में भी इनमें से कुछ की प्राथमिकता पार्टी टिकट हासिल करना है। ऐसा नहीं होने पर एक बार फिर से यह नेता पार्टी वोट बांट सकते हैं। दोनों ही पार्टियों के बागी अपने अपने प्रत्याशियों की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं। अब देखना यह है कि समय रहते कौन इन्हें शांत करके डैमेज कंट्रोल करने की पहल करता है। चुनावों में मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच होगा यह सब जानते हैं लेकिन असली मुकाबला इससे पहले शुरू हो चुका है और यह अपनी ही पार्टी के बागी लोगों से है। जो यह पहला मुकाबला जितने में सफल होगा, चुनावों में उसकी जीत की उम्मीदें उतनी ही अधिक होंगी।

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