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जत्ती परंपरा पर शोध करेगा करसोग का धर्मेंद्र

जत्ती परंपरा पर शोध करेगा करसोग का धर्मेंद्र

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मंडी। करसोग कुन्हो गांव के धर्मेंद्र शर्मा जत्ती परंपरा पर शोध करेंगे। उन्हें दो साल का यह प्रोजेक्ट भारत सरकार मिनिस्ट्री ऑफ़ कल्चर व सांस्कृतिक संसाधन और प्रशिक्षण केंद्र दिल्ली” {CCRT} के संयुक्त तत्वाधान से मिला है। इस प्रोजेक्ट के तहत धर्मेन्द्र कुमार शर्मा इस विलुप्त होती सांस्कृतिक लोक विधा पर कार्य कर रहे हैं। धर्मेंद्र का कहना है कि भारत सरकार ने उनका चयन किया है, जिसके बाद वह बेहद उत्साहित किया। उन्होंने कहा कि इस लोक संस्कृति की पुरातन लोक-विधा व संस्कृति के संरक्षण के लिए करसोग की “जत्ती परंपरा” पर शोधकार्य किया जाएगा, ताकि इस अनमोल धरोहर को आने वाली पीढ़ी के लिए संरक्षित रखा जा सके। वर्तमान समय में ‘जत्ती’ गायन, वादन व नृत्य विधा के उत्सव, परंपराएं और जानकार बुजुर्ग नाममात्र ही रह गए हैं और नई पीढ़ी इस धरोहर की और मुंह फेरे हुए है जो कि अत्यंत चिंतनीय है।

उनका कहना है ‘यदि समय रहते इन अमूल्य विरासतों को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ी इनसे पूर्णत: अछूती रह जाएगी। परिणामस्वरूप हम सामाजिक एकता के इन मुख्य स्तभों को हमेशा के लिए खो देंगे, जिसकी भरपाई शायद फिर कभी संभव न हो।  

क्या है जत्ती का अर्थ

वास्तव में ‘जत्ती’ शब्द संस्कृत के ‘यति’ शब्द का शब्दरूप है, जिसका अर्थ ऋषि-मुनियों ने शिवपुराण में ‘योगी’ बताया है। ऐसा भक्त जो अपने कुलदेव की आराधना में पूर्णत: लीन होकर भक्ति करे। कालान्तर में ग्रामीण पर्वतों में रहने वाले ऋषि-मुनियों के बाद जब शिक्षा का स्तर गिरने लगा तो ग्रामीण लोग ऋषि-मुनियों की अपने कुलदेवों के लिए भक्ति गाथाओं को ग्रामीण भाषाओं व लोक बोलियों में प्रचार करने लगे, यहीं से ‘यति’ शब्द अपभ्रंश होकर ‘जत्ती’ कहलाया।

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